भारत के पहले आपदा पीड़ित पहचान दिशा-निर्देश
जनवरी 2026 में राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) द्वारा जारी आपदा पीड़ित पहचान (Disaster Victim Identification – DVI) के लिए भारत के पहले दिशा-निर्देश और मानक संचालन प्रक्रिया (SOP), सामूहिक हताहत वाली घटनाओं में मानव अवशेषों की पहचान, पंजीकरण और परिवारों को सम्मानजनक तरीके से सौंपने को सुनिश्चित करने के लिए बनाए गए हैं। इन्हें तैयार करने के पीछे मुख्य कारण यह था कि आपदाओं के कई पीड़ित अज्ञात रह जाते थे या उनकी पहचान करना कठिन होता था।
यह दस्तावेज़ पुलिस, स्वास्थ्य अधिकारियों और आपातकालीन प्रतिक्रियाकर्ताओं जैसे विभिन्न हितधारकों की भूमिकाओं और जिम्मेदारियों को रेखांकित करता है, साथ ही DVI प्रक्रिया के चार चरणों से निपटने के लिए एक एकीकृत कमान (Unified Command) की आवश्यकता पर बल देता है।
प्रमुख बिंदु (Key Highlights):
- फॉरेंसिक पुरातत्व (Forensic Archaeology): यह मिट्टी के वातावरण में समय के साथ दबे मानव अवशेषों और साक्ष्यों को खोजने और निकालने के लिए व्यवस्थित उत्खनन और ‘स्ट्रेटिग्राफिक’ (स्तर-विज्ञान) सिद्धांतों का उपयोग करता है। ये विधियां भूस्खलन, इमारतों के ढहने आदि जैसी घटनाओं में महत्वपूर्ण हैं जहां साक्ष्यों का स्थानिक संदर्भ और शरीर की संरचना बिगड़ जाती है।
- सीख और नवाचार: यह दस्तावेज़ एयर इंडिया विमान दुर्घटना से मिले सबक पर आधारित है, जिसमें पीड़ितों की पहचान के लिए DNA विश्लेषण के अलावा फॉरेंसिक ओडोन्टोलॉजी (दंत विज्ञान) का उपयोग किया गया था।
- राष्ट्रीय दंत डेटा रजिस्ट्री (National Dental Data Registry): दिशा-निर्देशों में एक राष्ट्रीय रजिस्ट्री बनाने की सिफारिश की गई है ताकि पहचान के लिए ‘एंटे-मॉर्टम’ (मृत्यु से पहले का डेटा) की तुलना ‘पोस्ट-मॉर्टम’ डेटा से की जा सके।
पहचान के प्रकार (Identifiers):
इंटरपोल के DVI दिशा-निर्देशों (2023) के अनुसार, पहचान के दो स्तर होते हैं:
| पहचानकर्ता प्रकार | उदाहरण | सटीकता |
| प्राथमिक (वैज्ञानिक) | उंगलियों के निशान (Fingerprints), ओडोन्टोलॉजी, DNA प्रोफाइलिंग | उच्च (सटीक) |
| द्वितीयक | टैटू, निशान (Scars) और आभूषण | कम (अपुष्ट) |


