टर्टल ट्रेल्स विकसित करने के प्रस्ताव पर चिंता
केंद्रीय बजट में ओडिशा, कर्नाटक और केरल के तटीय क्षेत्रों में ‘टर्टल ट्रेल्स’ (Turtle Trails) विकसित करने के प्रस्ताव ने संरक्षणवादियों और शोधकर्ताओं के बीच चिंता पैदा कर दी है। उनका तर्क है कि सामूहिक घोंसला बनाने वाले (mass nesting) स्थलों को मानवीय दबाव से मुक्त रखा जाना चाहिए।
इस विवाद और इसके पीछे के वैज्ञानिक कारणों का विवरण यहाँ दिया गया है:
संरक्षणवादियों की मुख्य चिंताएं
- प्रकाश प्रदूषण (Light Pollution): ओलिव रिडले कछुए प्रकाश के प्रति अत्यधिक संवेदनशील होते हैं। कृत्रिम रोशनी उन्हें भ्रमित (distract) कर सकती है, जिससे वे समुद्र की दिशा भूल सकते हैं।
- पारिस्थितिक शांति का उल्लंघन: ‘टर्टल ट्रेल’ के माध्यम से ईकोटूरिज्म की अनुमति देने से इन क्षेत्रों की शांति भंग होगी और सामूहिक घोंसले के लिए उपयुक्त प्राकृतिक स्थितियाँ बदल सकती हैं।
- मानवीय दबाव (Anthropogenic Pressure): विशेषज्ञों का मानना है कि इन संवेदनशील क्षेत्रों को किसी भी प्रकार की पर्यटन गतिविधि से दूर रखा जाना चाहिए।
ओलिव रिडले कछुए और ‘अरिबाडा’ (Arribada)
लुप्तप्राय ओलिव रिडले समुद्री कछुओं का सामूहिक घोंसला बनाना, जिसे ‘अरिबाडा’ कहा जाता है, एक अत्यंत दुर्लभ घटना है।
- यह केवल भारत, कोस्टा रिका और दुनिया के कुछ ही चुनिंदा तटों पर देखी जाती है।
- ओडिशा का महत्व: ओडिशा दुनिया का सबसे बड़ा सामूहिक घोंसला बनाने वाला मैदान है।
ओडिशा के प्रमुख घोंसला स्थल
ओडिशा में मुख्य रूप से दो स्थान हैं जहाँ यह दुर्लभ घटना होती है:
- गहिरमाथा (केंद्रपाड़ा जिला): यह दुनिया का सबसे बड़ा सामूहिक घोंसला स्थल है। सामरिक कारणों (चांदीपुर स्थित इंटीग्रेटेड टेस्ट रेंज के करीब होने के कारण) से यहाँ बाहरी लोगों का प्रवेश प्रतिबंधित है।
- ऋषिकुल्या मुहाना (गंजम जिला): यहाँ भी कछुए भारी संख्या में अंडे देने आते हैं और यह शोध का एक प्रमुख केंद्र है।
संरक्षणवादियों का तर्क है कि जहाँ बजट का उद्देश्य ‘नीली अर्थव्यवस्था’ (Blue Economy) को बढ़ावा देना है, वहीं इन कछुओं के अस्तित्व के लिए ‘शून्य मानवीय हस्तक्षेप’ सबसे सुरक्षित मार्ग है


