आंध्र प्रदेश की ‘पोंडुरु खादी’ को मिला GI टैग
भारतीय हस्तशिल्प और विरासत के लिए एक गौरवशाली क्षण में, आंध्र प्रदेश की प्रसिद्ध पोंडुरु खादी को आधिकारिक तौर पर ज्योग्राफिकल इंडिकेशन (GI) टैग प्रदान किया गया है। ज्योग्राफिकल इंडिकेशंस रजिस्ट्री ने इसका पंजीकरण खादी और ग्रामोद्योग आयोग (KVIC) के पक्ष में किया है। इस टैग के मिलने से अब इस दुर्लभ और पारंपरिक कपड़े को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कानूनी सुरक्षा और एक विशिष्ट पहचान प्राप्त होगी।
क्यों खास है पोंडुरु खादी?
आंध्र प्रदेश के श्रीकाकुलम जिले के पोंडुरु गांव में निर्मित यह कपड़ा अपनी शुद्धता और सदियों पुरानी निर्माण प्रक्रिया के लिए जाना जाता है। इसे स्थानीय रूप से ‘पटनुलु’ के नाम से भी पुकारा जाता है।
पोंडुरु खादी की अनूठी विशेषताएं:
पंजीकरण दस्तावेजों के अनुसार, इस खादी की कुछ विशेषताएं इसे दुनिया के अन्य वस्त्रों से अलग बनाती हैं:
- प्राकृतिक कच्चा माल: यह कपड़ा इसी क्षेत्र में विशेष रूप से उगाए जाने वाले हिल कॉटन, पुनासा कॉटन और रेड कॉटन का उपयोग करके बनाया जाता है।
- अनोखी सफाई तकनीक: दुनिया में संभवतः यह एकमात्र ऐसी जगह है जहाँ कपास की सफाई के लिए ‘वालुगा मछली’ (Wallago Attu) की जबड़े की हड्डी का उपयोग किया जाता है। यह प्राचीन तकनीक रेशों को बिना नुकसान पहुँचाए उनकी अशुद्धियों को दूर करती है।
- उच्च गुणवत्ता (High Count): पोंडुरु खादी अपने असाधारण यार्न काउंट (धागे की बारीकी) के लिए प्रसिद्ध है। यह 100 से 120 काउंट तक की बारीकी तक पहुँचती है, जो इसकी श्रेष्ठ गुणवत्ता और हाथ की बुनाई के कौशल को दर्शाती है।
- पूर्णतः हस्तनिर्मित: कपास की सफाई से लेकर कताई और अंतिम बुनाई तक की पूरी प्रक्रिया बिना किसी मशीन के, पूरी तरह हाथों से संपन्न की जाती है।
जीआई टैग के लाभ
विशेषज्ञों का मानना है कि GI टैग मिलने से पोंडुरु खादी की प्रामाणिकता की रक्षा होगी और बाजार में इसके नाम पर बिकने वाले नकली उत्पादों पर रोक लगेगी।


