सोमनाथ पर प्रथम हमले के 1000 वर्ष पूरे होने पर प्रधानमंत्री का विशेष लेख
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वर्ष 1026 ईस्वी में सोमनाथ मंदिर पर हुए पहले बड़े हमले के 1000 वर्ष पूरे होने के ऐतिहासिक अवसर पर एक विशेष लेख साझा किया है। प्रधानमंत्री ने अपने लेख में सोमनाथ को केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि भारत की उस सांस्कृतिक चेतना का प्रतीक बताया है जिसे सदियों के आक्रमण भी डिगा नहीं सके।
विनाश से विकास तक: सोमनाथ की अमर गाथा
प्रधानमंत्री ने ज़ोर दिया कि सोमनाथ का इतिहास विनाश और पुनर्निर्माण की एक ऐसी कहानी है, जो दुनिया को भारत की “अटूट भावना” से परिचित कराती है। उन्होंने कहा, “यह कहानी केवल पत्थरों के एक मंदिर की नहीं है, बल्कि भारत माता के उन अनगिनत सपूतों के साहस की है जिन्होंने हमारी सभ्यता की रक्षा की।”
आगामी ऐतिहासिक पड़ाव: वर्ष 2026 में आधुनिक सोमनाथ मंदिर के उद्घाटन के 75 वर्ष भी पूरे हो रहे हैं। मई 1951 में देश के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने इस भव्य मंदिर को भक्तों के लिए समर्पित किया था।
इतिहास के झरोखे से: हमले और पुनरुत्थान की समयरेखा
गुजरात के सौराष्ट्र क्षेत्र के प्रभास पाटन (वेरावल) में समुद्र तट पर स्थित यह ज्योतिर्लिंग सदियों से आक्रमणकारियों के निशाने पर रहा, लेकिन हर बार यह और अधिक भव्यता के साथ उठ खड़ा हुआ:
| वर्ष | घटना | विवरण |
| 1026 | पहला बड़ा हमला | तुर्की शासक महमूद गजनवी ने भीम प्रथम के शासनकाल में मंदिर लूटा और ज्योतिर्लिंग को खंडित किया। |
| 1169 | पत्थर का निर्माण | राजा कुमारपाल ने पुराने लकड़ी के मंदिर की जगह ‘उत्कृष्ट पत्थर’ का भव्य मंदिर बनवाया। |
| 1299 | खिलजी का आक्रमण | अलाउद्दीन खिलजी की सेना (उलुग खान) ने मंदिर को नुकसान पहुँचाया। |
| 1308-51 | द्वितीय पुनर्निर्माण | राजा महिपाल प्रथम और उनके पुत्र खेंगारा ने मंदिर का जीर्णोद्धार किया। |
| 1395 | ज़फ़र खान का हमला | गुजरात सल्तनत के संस्थापक ने मंदिर को तीसरी बार निशाना बनाया। |
आधुनिक भारत और सरदार पटेल का संकल्प
स्वतंत्रता के बाद सोमनाथ के कायाकल्प का श्रेय प्रधानमंत्री ने देश के पहले उप-प्रधानमंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल को दिया।
- 12 नवंबर 1947: जूनागढ़ यात्रा के दौरान सरदार पटेल ने खंडहरों को देख उसी स्थान पर मंदिर के पुनर्निर्माण का पवित्र संकल्प लिया।
- सोमनाथ ट्रस्ट: मंदिर निर्माण की देखरेख के लिए ट्रस्ट बनाया गया और जन-सहयोग से धन जुटाया गया।
- मई 1951: डॉ. राजेंद्र प्रसाद की उपस्थिति में मंदिर का प्राण-प्रतिष्ठा समारोह संपन्न हुआ।


