127 साल बाद भारत में फिर एक हुए भगवान बुद्ध के पवित्र पिपरहवा अवशेष
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 3 जनवरी, 2026 को राजधानी के राय पिथौरा कल्चरल कॉम्प्लेक्स में “द लाइट एंड द लोटस: रेलिक्स ऑफ द अवेकन्ड वन” नामक भव्य अंतरराष्ट्रीय प्रदर्शनी का उद्घाटन किया। यह प्रदर्शनी केवल एक कलात्मक आयोजन नहीं, बल्कि एक ऐतिहासिक पुनर्मिलन है, जिसमें भगवान बुद्ध के पवित्र पिपरहवा अवशेषों को एक सदी से भी अधिक समय के बाद एक साथ प्रदर्शित किया गया है।
प्रदर्शनी का मुख्य आकर्षण: अवशेषों का ऐतिहासिक घर वापसी
यह आयोजन भगवान बुद्ध के उन रत्न अवशेषों के फिर से मिलने का प्रतीक है, जिन्हें 127 साल पहले दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में भेज दिया गया था। संस्कृति मंत्रालय के निर्णायक हस्तक्षेप के बाद, 2025 में पेप्पे परिवार के पास मौजूद अवशेषों के हिस्से को वापस लाया गया, जिससे अब ये सभी पवित्र वस्तुएं भारतीय धरती पर एक साथ आ सकी हैं।
पिपरहवा अवशेषों की ऐतिहासिक यात्रा
इन अवशेषों का इतिहास बेहद रोचक और महत्वपूर्ण है:
- खोज: 1898 में विलियम क्लैक्सटन पेप्पे ने उत्तर प्रदेश के कपिलवस्तु (पिपरहवा) के प्राचीन स्तूप में इन अवशेषों की खोज की थी।
- विभाजन: खोज के बाद, इन अवशेषों को तीन मुख्य हिस्सों में बांटा गया:
- एक हिस्सा स्याम (थाईलैंड) के राजा को भेंट किया गया।
- दूसरा हिस्सा इंग्लैंड ले जाया गया (जो अब वापस आ चुका है)।
- तीसरा हिस्सा कोलकाता के भारतीय संग्रहालय में संरक्षित किया गया।
- पुनर्प्राप्ति: 2025 में, पेप्पे परिवार के पास मौजूद हिस्से को नीलामी से रोककर भारत वापस लाया गया, जिसे वैश्विक बौद्ध समुदाय का भारी समर्थन मिला।


