सुप्रीम कोर्ट का लोक प्रहरी वाद में बड़ा बदलाव

सुप्रीम कोर्ट ने 17 दिसंबर 2025 को लोक प्रहरी वाद में अपने 2021 के फैसले में संशोधन किया। इससे हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस को संविधान के अनुच्छेद 224A के तहत नियुक्त एड-हॉक जजों (तदर्थ न्यायाधीशों) वाली डिवीजन बेंच की संरचना तय करने में अधिक लचीलापन मिला। यह कदम हाई कोर्टों में बढ़ते बैकलॉग को कम करने की दिशा में महत्वपूर्ण है।

रिटायर्ड जजों की हिचकिचाहट पर CJI का बयान

सुनवाई के दौरान भारत के चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने खुलासा किया कि रिटायर्ड हाई कोर्ट जज एड-हॉक जज के रूप में बेंच में लौटने से हिचकिचाते हैं। कारण है युवा सेवारत न्यायाधीशों के साथ जूनियर जज की तरह बैठने में होने वाली “शर्मिंदगी”। CJI ने कहा कि यह मनोवैज्ञानिक बाधा बैकलॉग घटाने के प्रयासों को प्रभावित कर रही है।

हाई कोर्टों में भयंकर बैकलॉग

देशभर के 25 हाई कोर्ट बढ़ते केसों से दबे हैं, खासकर आपराधिक मामलों में। नेशनल ज्यूडिशियल डेटा ग्रिड के अनुसार, 18,98,833 आपराधिक मामले लंबित हैं। इनमें 68.27% या 12,96,374 मामले एक साल से अधिक पुराने हैं। स्वीकृत 1,122 जज पदों में से 15 दिसंबर तक 298 पद खाली हैं।

अनुच्छेद 224A को सक्रिय करने का इतिहास

जनवरी 2025 के एक फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद 224A को सक्रिय किया। इससे हाई कोर्ट चीफ जस्टिस को आपराधिक अपीलों के लिए रिटायर्ड जजों को एड-हॉक जज नियुक्त करने की शक्ति मिली। यह अनुच्छेद रिटायर्ड हाई कोर्ट जजों को तदर्थ आधार पर बुलाने की अनुमति देता है।

2021 बनाम 2025: प्रमुख बदलाव

अप्रैल 2021 के लोक प्रहरी बनाम भारत संघ फैसले में निर्देश थे:

  • दो एड-हॉक जजों को डिवीजन बेंच में एक साथ बैठना अनिवार्य।
  • चीफ जस्टिस का विवेक तब इस्तेमाल जब 20% से अधिक पद खाली, 5+ साल पुराने केस, 10% बैकलॉग 5+ साल पुराना, या निपटान दर कम।

जनवरी 2025 के फैसले ने इसे बदला—एक एड-हॉक जज को अनिवार्य रूप से एक सेवारत जज के साथ बैठना होगा। 17 दिसंबर का संशोधन इससे और लचीलापन जोड़ता है।

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