अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने ट्रंप के जन्मसिद्ध नागरिकता वाले आदेश को रद्द कर दिया
अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने 30 जून को एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए ट्रंप प्रशासन के उस कार्यकारी आदेश को असंवैधानिक करार दिया है, जिसमें जन्म के आधार पर नागरिकता (birthright citizenship) को समाप्त करने का प्रयास किया गया था। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि अमेरिका की धरती पर जन्म लेने वाला प्रत्येक बच्चा अमेरिकी नागरिक है, चाहे उनके माता-पिता देश में अवैध रूप से रह रहे हों या अस्थायी तौर पर।
यह फैसला राष्ट्रपति के दूसरे कार्यकाल के आव्रजन (immigration) एजेंडे के लिए एक बड़ा न्यायिक झटका माना जा रहा है। इसके साथ ही कोर्ट ने 150 साल से अधिक पुरानी संवैधानिक गारंटी पर अपनी मुहर लगा दी है।
अमेरिकी संविधान में 14वां संशोधन
अमेरिकी संविधान का 14वां संशोधन यह सुनिश्चित करता है कि “संयुक्त राज्य अमेरिका में पैदा हुआ या प्राकृतिक रूप से नागरिक बना, और जो उसके क्षेत्राधिकार के अधीन है, वह संयुक्त राज्य अमेरिका का नागरिक है।”
इतिहास: अमेरिकी गृहयुद्ध के बाद 1868 में लागू किए गए इस संशोधन का मुख्य उद्देश्य पूर्व गुलामों को नागरिकता का अधिकार देना था।
कानूनी व्याख्या: अदालतों ने लंबे समय से इसकी व्याख्या करते हुए कहा है कि अमेरिकी भूमि पर जन्म लेने वाले लगभग सभी लोगों को नागरिकता मिलनी चाहिए। इसमें केवल दो अपवाद हैं—विदेशी राजनयिकों के बच्चे और शत्रुतापूर्ण कब्जे के दौरान मौजूद दुश्मन देश के नागरिक।
सिद्धांत: यह ‘जस सोली’ (jus soli) या “भूमिपुत्र का अधिकार” नामक अंग्रेजी कॉमन लॉ सिद्धांत पर आधारित है, जहां नागरिकता माता-पिता की पहचान के बजाय जन्म स्थान से तय होती है।
राष्ट्रपति ट्रम्प ने अपने दूसरे कार्यकाल के शुरुआती घंटों में ही एक कार्यकारी आदेश पर हस्ताक्षर किए थे। इसमें तर्क दिया गया था कि अवैध या अस्थायी रूप से रह रहे माता-पिता की संतानें अमेरिका के “क्षेत्राधिकार” में नहीं आतीं, इसलिए वे 14वें संशोधन के तहत नागरिकता की हकदार नहीं हैं। अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क को खारिज कर दिया है।
भारत की स्थिति: क्या भारत में ‘बर्थराइट सिटीजनशिप’ है?
अमेरिकी परिदृश्य के विपरीत, भारत में समय के साथ नागरिकता के नियमों में महत्वपूर्ण बदलाव आए हैं।
संविधान और 1955 का अधिनियम: भारतीय संविधान का अनुच्छेद 5 और नागरिकता अधिनियम, 1955 (धारा 3) मूल रूप से भारत में जन्मे प्रत्येक व्यक्ति को नागरिकता प्रदान करते थे। उस समय केवल विदेशी दूतों और दुश्मन देशों के बच्चों के लिए अपवाद थे।
1986 का संशोधन: बांग्लादेश, श्रीलंका और कुछ अफ्रीकी देशों से प्रवासियों के आने के बाद, संसद ने 1986 में कानून बदला। इसके बाद, केवल जन्म स्थान के आधार पर नागरिकता मिलना बंद हो गई और यह अनिवार्य कर दिया गया कि बच्चे के माता-पिता में से कम से कम एक भारतीय नागरिक हो।
2003 का संशोधन: नागरिकता अधिनियम में एक और संशोधन किया गया, जिसके तहत यदि माता-पिता में से कोई भी बच्चा के जन्म के समय अवैध प्रवासी है, तो बच्चा जन्म से भारतीय नागरिक नहीं माना जाएगा।
मुख्य अंतर: अमेरिका का सुप्रीम कोर्ट जहां आज भी ‘भूमि पुत्र के अधिकार’ (14वें संशोधन) को मजबूती से बरकरार रखे हुए है, वहीं भारत ने 1986 और 2003 के संशोधनों के जरिए जन्म के आधार पर मिलने वाली नागरिकता को पूरी तरह समाप्त कर दिया है और इसे माता-पिता की नागरिकता से जोड़ दिया है।
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