छात्रों की आत्महत्या पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित नेशनल टास्क फोर्स (NTF) की रिपोर्ट
विद्यार्थियों के मानसिक स्वास्थ्य और आत्महत्या पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित नेशनल टास्क फोर्स (NTF) की 8 जून को जारी अंतरिम रिपोर्ट में तर्क दिया गया है कि भारत में विद्यार्थियों की आत्महत्याओं को केवल मानसिक स्वास्थ्य के मुद्दे के रूप में नहीं समझा जा सकता।
रिपोर्ट ने कैंपस सहायता प्रणालियों, मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं, संकाय (faculty) भर्ती और छात्रवृत्ति वितरण में व्यापक सुधार की सिफारिश करते हुए कहा है कि उच्चतर शिक्षा प्रशासन में छात्र कल्याण को केंद्र में रखा जाना चाहिए।
NTF का गठन मार्च 2025 में सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति एस. रवींद्र भट की अध्यक्षता में किया गया था। इसमें विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञ शामिल हैं।
NTF का मुख्य तर्क यह है कि छात्र आत्महत्याओं को अब तक मानसिक स्वास्थ्य की समस्या के रूप में देखा गया है, जबकि वास्तव में यह एक संरचनात्मक समस्या है। इस प्रश्न पर पहले गठित प्रत्येक रिपोर्ट ने समस्या को मुख्य रूप से परामर्श बुनियादी ढांचे और व्यक्तिगत कल्याण के नजरिए से देखा। सबसे बड़ी कमी आत्महत्या को रोकने के लिए किसी भी प्रत्यक्ष कानूनी, विनियामक या संस्थागत ढांचे का पूर्ण अभाव है।
रिपोर्ट के अनुसार, इस समस्या से निपटने के लिए अधिकांश कदम सामान्य और प्रतिक्रियात्मक हैं।
यह ‘नेशनल सुसाइड प्रिवेंशन स्ट्रैटेजी’ (राष्ट्रीय आत्महत्या निवारण रणनीति) को, जो इस विषय पर भारत का एकमात्र विशेष नीतिगत उपाय है, “अस्पष्ट और बिना किसी स्पष्ट कार्यान्वयन दिशा-निर्देशों वाला” बताती है। अमेरिका, जापान, दक्षिण कोरिया और कनाडा जैसे देशों ने ऐसे कानून बनाए हैं जो संस्थान की जवाबदेही तय करते हैं और डेटा संग्रह को अनिवार्य बनाते हैं। इस दिशा में भारत का कदम अभी भी केवल दिशा-निर्देशों के जारी करने के स्तर तक ही सीमित है।


