BIS ने टी-बैग्स में एपिक्लोरोहाइड्रिन के उपयोग पर प्रतिबंध लगाया
भारत सरकार ने भारतीय मानक ब्यूरो (BIS) के माध्यम से टी-बैग्स (चाय की थैलियों) के लिए देश का पहला व्यापक गुणवत्ता और सुरक्षा ढांचा पेश किया है। यह कदम उपभोक्ता सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए उठाया गया है, जिसका मुख्य उद्देश्य चाय को उबालते समय पैकेजिंग से रसायनों के चाय में मिलने की समस्या को रोकना है।
BIS के नए ढांचे की मुख्य विशेषताएं
- हानिकारक रसायनों पर प्रतिबंध: इन मानकों के तहत टी-बैग्स के उत्पादन में एपिक्लोरोहाइड्रिन (Epichlorohydrin) और क्लोरीन ब्लीचिंग के उपयोग पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगा दिया गया है।
- एपिक्लोरोहाइड्रिन: ऐतिहासिक रूप से इसे “वेट-स्ट्रेन्थिंग एजेंट” (गीला होने पर फटने से बचाने वाला तत्व) के रूप में इस्तेमाल किया जाता था। इसे IARC और अमेरिकी राष्ट्रीय विष विज्ञान कार्यक्रम (US नेशनल टॉक्सिकोलॉजी प्रोग्राम ) द्वारा संभावित कार्सिनोजेन (कैंसर पैदा करने वाला पदार्थ) के रूप में वर्गीकृत किया गया है।
- क्लोरीन ब्लीचिंग: डायॉक्सिन जैसे हानिकारक उप-उत्पादों के बनने के डर से इसे प्रतिबंधित किया गया है।
- सभी घटकों का नियमन: यह मानक केवल चाय तक ही सीमित नहीं है, बल्कि टी-बैग के हर हिस्से को कवर करता है:
- सामग्री: टी-बैग का पेपर वर्जिन पल्प से बना होना चाहिए और इसमें अबाका (केले के परिवार का एक रेशा) जैसे प्राकृतिक फाइबर का उपयोग किया जा सकता है।
- स्याही और गोंद: स्याही और एडहेसिव (गोंद) को ‘फूड-कॉन्टैक्ट’ सुरक्षा मानकों का पालन करना अनिवार्य है।
- संरचनात्मक तत्व: धागा सूती होना चाहिए और टैग्स/फास्टनर की गुणवत्ता पर भी कड़ी निगरानी रखी जाएगी।
- सुरक्षा और माइग्रेशन परीक्षण: इस मानक की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता ‘माइग्रेशन टेस्ट’ है। ये परीक्षण यह सुनिश्चित करते हैं कि गर्म पानी में चाय को डुबाने पर बैग, स्याही, धागे या गोंद से कोई भी हानिकारक रसायन चाय में न घुले।
- लेबलिंग और ट्रेसिबिलिटी: निर्माताओं के लिए सख्त लेबलिंग नियमों का पालन करना अनिवार्य है, जिसमें निर्माता का नाम, पता, बैच नंबर, निर्माण की तारीख और समाप्ति तिथि (एक्सपायरी) शामिल है।


