भारत ने सिंधु जल संधि पर मध्यस्थता न्यायालय के ‘पॉन्डेज’ संबंधी फैसले को खारिज किया
भारत ने सिंधु नदी प्रणाली पर भारतीय जलविद्युत परियोजनाओं में अधिकतम पौंडेज (pondage/जल भंडारण) के संबंध में द हेग (The Hague) स्थित मध्यस्थता न्यायालय (CoA) द्वारा 15 मई, 2026 को जारी किए गए कथित फैसले (award) को 16 मई को खारिज कर दिया है। भारत ने दोहराया है कि वह इस ट्रिब्यूनल के गठन को वैध नहीं मानता। भारत ने कहा कि सिंधु जल संधि (IWT) को “स्थगित” (abeyance) रखने का उसका निर्णय अभी भी लागू है।
भारत लगातार यह रुख अपनाए हुए है कि इस मामले की जांच के लिए गठित किया गया तथाकथित मध्यस्थता न्यायालय (CoA) “अवैध रूप से गठित” किया गया था। गौरतलब है कि 22 अप्रैल, 2025 को हुए पहलगाम आतंकवादी हमले के एक दिन बाद, भारत ने पाकिस्तान के खिलाफ कई दंडात्मक कदम उठाए थे, जिसमें 1960 की सिंधु जल संधि को “स्थगित” करना भी शामिल था। यह फैसला किशनगंगा और रतले जलविद्युत परियोजनाओं पर पाकिस्तान की आपत्तियों से संबंधित मामले में आया है।
सिंधु जल संधि (IWT) की मुख्य विशेषताएं
- हस्ताक्षर: भारत और पाकिस्तान के बीच नौ साल की लंबी बातचीत के बाद 19 सितंबर, 1960 को इस संधि पर हस्ताक्षर किए गए थे।
- संरचना: इस संधि में कुल 12 अनुच्छेद (Articles) और 8 एनेक्सचर/परिशिष्ट (Annexures A से H) शामिल हैं।
- नदियों का विभाजन:
- पूर्वी नदियां (Eastern Rivers): सतलुज, ब्यास और रावी का सारा पानी भारत के “अप्रतिबंधित उपयोग” के लिए उपलब्ध रहेगा।
- पश्चिमी नदियां (Western Rivers): सिंधु, झेलम और चिनाब का पानी पाकिस्तान को प्राप्त होगा।
- भारत के अधिकार: यह संधि भारत को पश्चिमी नदियों के पानी का भी सीमित और गैर-उपभोग्य (non-consumptive) उपयोग करने की अनुमति देती है (जैसे कि रन-ऑफ-द-रिवर जलविद्युत परियोजनाएं)।
द्विपक्षीय व्यवस्था: भारत का हमेशा से यह रुख रहा है कि यह संधि मूल रूप से एक द्विपक्षीय (bilateral) व्यवस्था है। इसमें केवल विश्व बैंक (जिसने मध्यस्थता की भूमिका निभाई थी) ही प्रक्रियात्मक भूमिका में स्वीकृत तीसरा पक्ष (third party) है।


