राष्ट्रपति मुर्मू ने सुप्रीम कोर्ट में जजों की संख्या बढ़ाने के लिए अध्यादेश जारी किया

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने 17 मई, 2026 को एक अध्यादेश (ऑर्डिनेंस) जारी किया है, जिसके तहत सुप्रीम कोर्ट में न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाकर 37 (भारत के मुख्य न्यायाधीश यानी CJI को छोड़कर) कर दी गई है। आधिकारिक राजपत्र (ऑफिशियल गजट) में प्रकाशित अधिसूचना के अनुसार, ‘सुप्रीम कोर्ट (न्यायाधीशों की संख्या) संशोधन अध्यादेश 2026’ पर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू द्वारा 17 मई को हस्ताक्षर किए गए थे। अध्यादेश के अनुसार, “सुप्रीम कोर्ट (न्यायाधीशों की संख्या) अधिनियम, 1956 की धारा 2 में, ‘तैंतीस (thirty-three)’ शब्द के स्थान पर ‘सैंतीस (thirty-seven)’ शब्द प्रतिस्थापित किया जाएगा।” इसमें भारत के मुख्य न्यायाधीश शामिल नहीं होंगे। 

अध्यादेश (Ordinance) से जुड़े महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रावधान

  • अनुच्छेद 123 (Article 123): यह संविधान के तहत राष्ट्रपति को संसद के सत्रावसान (recess/जब संसद का सत्र न चल रहा हो) के दौरान अध्यादेश प्रख्यापित (promulgate) करने की शक्ति देता है। इसके अनुसार, “यदि किसी समय, उस समय को छोड़कर जब संसद के दोनों सदन सत्र में हैं, राष्ट्रपति को यह समाधान हो जाता है कि ऐसी परिस्थितियाँ विद्यमान हैं जिनके कारण उनके लिए तुरंत कार्रवाई करना आवश्यक हो गया है, तो वह ऐसे अध्यादेश प्रख्यापित कर सकेंगे जो उन्हें उन परिस्थितियों में आवश्यक प्रतीत हों।”
  • अध्यादेश का प्रभाव: किसी अध्यादेश का “वही बल और प्रभाव होगा जो संसद के किसी अधिनियम (Act) का होता है”।
  • संसद की मंजूरी और समय सीमा: सरकार के लिए किसी भी अध्यादेश को मंजूरी (ratification) के लिए संसद के समक्ष लाना अनिवार्य होता है। ऐसा न करने पर, संसद के “पुनः समवेत (reassembly) होने की तारीख से छह सप्ताह की समाप्ति पर” यह स्वतः समाप्त (lapse) हो जाएगा।
  • पहले समाप्त होने की शर्तें: यदि राष्ट्रपति अध्यादेश को वापस ले लेते हैं, या यदि दोनों सदन इसे अस्वीकार करने का प्रस्ताव पारित कर देते हैं, तो यह छह सप्ताह से पहले भी समाप्त हो सकता है। (हालांकि, अध्यादेश की अस्वीकृति का सीधा मतलब यह होगा कि सरकार ने अपना बहुमत खो दिया है)।
  • शून्यता (Void): यदि कोई अध्यादेश ऐसा कानून बनाता है जिसे लागू करने के लिए संसद संविधान के तहत सक्षम नहीं है, तो उसे शून्य (void) माना जाएगा।
  • अनुच्छेद 213 (Article 213): यह अनुच्छेद राज्य विधानमंडल का सत्र न चलने की स्थिति में अध्यादेश जारी करने या उसे वापस लेने की राज्यपाल की व्यापक समरूप (analogous) शक्तियों से संबंधित है।

महत्वपूर्ण स्पष्टीकरण और न्यायिक निर्णय

  • समय सीमा की गणना: कोई अध्यादेश अगला सत्र शुरू होने की तारीख से छह सप्ताह या 42 दिनों के लिए वैध होता है। अनुच्छेदों (123 और 213) के स्पष्टीकरण के अनुसार, यदि दोनों सदन अलग-अलग तारीखों पर अपना सत्र शुरू करते हैं, तो बाद वाली तारीख को आधार माना जाएगा।

कृष्ण कुमार सिंह बनाम बिहार राज्य मामला (2017): वर्ष 2017 में, सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐसे मामले की जांच की थी जहां बिहार राज्य ने विधानमंडल के समक्ष रखे बिना एक ही अध्यादेश को कई बार पुन: प्रख्यापित (re-promulgated) किया था। इस मामले में अदालत की सात-न्यायाधीशों की पीठ ने दोहराया था कि कानून बनाने का कार्य सामान्यतः विधायिका द्वारा ही किया जाना चाहिए, और राज्यपाल की अध्यादेश जारी करने की शक्ति केवल एक आपातकालीन शक्ति (emergency power) की प्रकृति में है।

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