भूमिगत कोयला गैसीकरण (UCG)

केंद्रीय कोयला मंत्रालय ने हाल ही में चार कोयला खदानों के सफल बोलीदाताओं के साथ कोयला खदान/ब्लॉक उत्पादन और विकास समझौतों (CMDPAs) को निष्पादित किया है। यह भारत में वाणिज्यिक कोयला खदानों की पहली ऐसी किस्त है जिसमें भूमिगत कोयला गैसीकरण (Underground Coal Gasification – UCG) के अंतर्निहित प्रावधान शामिल हैं।

यह ऐतिहासिक कदम भारत के विशाल कोयला भंडार के पूर्ण मूल्य को अनलॉक करने की दिशा में एक क्रांतिकारी बदलाव का संकेत है। ये खदानें आंध्र प्रदेश और ओडिशा राज्यों में फैली हुई हैं, जिनमें से दो आंशिक रूप से अन्वेषित और दो पूर्ण रूप से अन्वेषित खदानें हैं। 

भूमिगत कोयला गैसीकरण (UCG) क्या है?

UCG कोयला उपयोग का एक आधुनिक दृष्टिकोण है जो पारंपरिक खनन की आवश्यकता के बिना, कोयले को सीधे खदान (in situ) के भीतर ही सिंथेटिक गैस (syngas) में परिवर्तित कर देता है।

इस तकनीक के मुख्य लाभ और अनुप्रयोग:

  • दुर्गम संसाधनों का दोहन: यह तकनीक उन गहरे, पतले या अन्यथा दुर्गम कोयला स्तरों (seams) से ऊर्जा निकालने में सक्षम है, जहाँ पारंपरिक खनन तकनीकें आर्थिक रूप से व्यावहारिक नहीं हैं।
  • खाद्य सुरक्षा और उर्वरक: UCG के माध्यम से उत्पादित सिनगैस (syngas) का उपयोग यूरिया और अमोनिया के निर्माण के लिए घरेलू फीडस्टॉक के रूप में किया जा सकता है। इससे उर्वरकों के आयात पर भारत की निर्भरता कम होगी।
  • रसायन और पेट्रोकेमिकल क्षेत्र: सिनगैस आयातित प्राकृतिक गैस और नेफ्था का स्थान ले सकती है। यह मेथनॉल, डाइमिथाइल ईथर (DME) और सिंथेटिक ईंधन के घरेलू उत्पादन में मदद करेगी।

ऊर्जा सुरक्षा: यह भारत के दोहन योग्य ऊर्जा संसाधन आधार का महत्वपूर्ण विस्तार करता है, जिससे देश ऊर्जा के क्षेत्र में अधिक आत्मनिर्भर बनेगा।

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