हैंगिंग ग्लेशियर

जर्नल नेचर (Nature) में प्रकाशित एक नए शोध पत्र के अनुसार, तेजी से बदलते जलवायु परिवर्तन ने हिमालयी ग्लेशियरों के बड़े हिस्सों को कमजोर कर दिया है। इसके परिणामस्वरूप बर्फ के अस्थिर टुकड़े बन गए हैं जो खड़ी ढलानों पर लटके हुए हैं और कभी भी टूट सकते हैं, जिससे उत्तराखंड में पर्यावरणीय आपदाओं का खतरा बढ़ गया है।

भारतीय विज्ञान संस्थान (IISc), भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) भुवनेश्वर और रक्षा भू-सूचना विज्ञान अनुसंधान प्रतिष्ठान (DGRE) के नेतृत्व में किए गए इस अध्ययन ने ऐसे 219 टुकड़ों का मानचित्रण किया है, जिन्हें “हैंगिंग ग्लेशियर” (Hanging Glaciers) कहा जाता है।

मुख्य निष्कर्ष और भौगोलिक संदर्भ:

  • परिभाषा: हैंगिंग ग्लेशियर आमतौर पर उन ग्लेशियरों को संदर्भित करते हैं जो खड़ी घाटी की दीवारों पर या लटकी हुई घाटियों (hanging valleys) के भीतर स्थित होते हैं और मुख्य ग्लेशियर (trunk glaciers) से अलग हो जाते हैं।
  • अध्ययन क्षेत्र: यह अध्ययन गढ़वाल हिमालय की अलकनंदा बेसिन में हैंगिंग ग्लेशियरों की एक व्यापक सूची प्रस्तुत करता है और उनके लक्षण वर्णन के लिए एक वर्गीकरण ढांचा प्रस्तावित करता है।
  • भू-गर्भीय संवेदनशीलता: हिमालयी क्षेत्र एक सक्रिय ‘कन्वर्जेंट प्लेट बाउंड्री’ (जहाँ टेक्टोनिक प्लेटें आपस में मिलती हैं) पर स्थित है। यहाँ उच्च भूकंपीयता और अत्यधिक खंडित आधारशिला (fractured bedrock) पाई जाती है। 

जोखिम के कारक:

  1. जलवायु और भू-विज्ञान का मेल: हिमनद-भूगर्भीय प्रक्रियाओं और जलवायु दबाव (climatic forcing) के बीच की परस्पर क्रिया हैंगिंग ग्लेशियरों की गतिशीलता और उनके कारण होने वाले निचले इलाकों के खतरों पर कड़ा नियंत्रण रखती है।
  2. शहरीकरण: हिमालयी क्षेत्रों में तेजी से होते शहरीकरण ने बस्तियों और बुनियादी ढांचे (जैसे बांध और सड़कें) के लिए इन खतरों के प्रति जोखिम और अधिक बढ़ा दिया है।

आपदा की संभावना: ये लटके हुए बर्फ के खंड जब टूटते हैं, तो वे हिमस्खलन या ग्लेशियर झील फटने जैसी घटनाओं (GLOF) को जन्म दे सकते हैं, जो उत्तराखंड जैसे राज्यों के लिए विनाशकारी साबित हो सकते हैं।

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