कल्पक्कम स्थित फास्ट ब्रीडर न्यूक्लियर रिएक्टर ने ‘क्रिटिकैलिटी प्राप्त की
प्रधानमंत्री ने कल्पक्कम में स्वदेशी रूप से विकसित प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर (PFBR) के ‘क्रिटिकैलिटी’ (Criticality) प्राप्त करने पर भारत के वैज्ञानिकों और इंजीनियरों को बधाई दी है। इसका अर्थ यह है कि रिएक्टर में परमाणु प्रतिक्रिया सुरक्षित रूप से ‘स्व-सस्टेनिंग’ (आत्म-निर्भर) हो गई है और अब यह बिजली पैदा करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।
यद्यपि PFBR को अपनी पूरी क्षमता तक पहुंचने में कुछ महीने लगेंगे और उपयोगी बिजली उत्पादन में इससे भी अधिक समय लग सकता है — क्योंकि यह उम्मीद के मुताबिक चल रहा है या नहीं, यह जांचने के लिए कम शक्ति पर कई प्रयोग किए जाने हैं जिनका मूल्यांकन परमाणु ऊर्जा नियामक बोर्ड (AERB) द्वारा किया जाएगा, जिसे वाणिज्यिक बिजली संचालन के लिए अपनी मंजूरी देनी होगी — यह भारत के परमाणु कार्यक्रम के दूसरे चरण की शुरुआत है।
आज, भारत अपनी नागरिक परमाणु यात्रा में एक निर्णायक कदम उठा रहा है और अपने परमाणु कार्यक्रम के दूसरे चरण को आगे बढ़ा रहा है। कल्पक्कम में स्वदेशी रूप से डिजाइन और निर्मित प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर ने ‘क्रिटिकैलिटी’ प्राप्त कर ली है। भारत के परमाणु रिएक्टर समृद्ध यूरेनियम (enriched uranium) के आयात पर भारी रूप से निर्भर हैं। 1950 के दशक में परिकल्पित भारत के तीन चरणों वाले कार्यक्रम का उद्देश्य थोरियम के उपयोग के माध्यम से आयात से स्वतंत्र होना और ऊर्जा सुरक्षा प्राप्त करना है, जिसका भारत के पास विशाल भंडार है। PFBR इसमें एक अनिवार्य सेतु (bridge) के रूप में कार्य करता है।
PFBR की तकनीकी विशेषताएं:
- क्षमता और डिजाइन: PFBR एक 500 मेगावाट (MWe) क्षमता का ‘सोडियम-कूल्ड, पूल-टाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर’ है।
- विकास: इसे इंदिरा गांधी परमाणु अनुसंधान केंद्र (IGCAR) द्वारा डिजाइन किया गया है और परमाणु ऊर्जा विभाग (DAE) के तहत भारतीय नाभिकीय विद्युत निगम लिमिटेड (BHAVINI) द्वारा निर्मित किया गया है।
- ईंधन: पारंपरिक थर्मल रिएक्टरों के विपरीत, PFBR यूरेनियम-प्लूटोनियम मिक्स्ड ऑक्साइड (MOX) ईंधन का उपयोग करता है।
- ब्रीडिंग प्रक्रिया: PFBR का कोर यूरेनियम-238 के एक ‘ब्लैंकेट’ (आवरण) से घिरा होता है। फास्ट न्यूट्रॉन उपजाऊ (fertile) यूरेनियम-238 को विखंडनीय (fissile) प्लूटोनियम-239 में बदल देते हैं, जिससे रिएक्टर अपने उपभोग की तुलना में अधिक ईंधन का उत्पादन करने में सक्षम हो जाता है।


