गिचक नकाणा-एक्विफर-ड्वेलिंग मछली

यूरोप, अमेरिका और भारत के मत्स्य विज्ञानियों (ichthyologists) के एक संयुक्त दल ने गिचक नकाणा की खोज की है। यह पूर्वोत्तर भारत से प्राप्त पहली एक्विफर-ड्वेलिंग (phreatobitic) मछली है, जो एशिया के इस हिस्से में पहले से अज्ञात भूमिगत जीवों (subterranean fauna) की पहली खोज मानी जा रही है।

इस महत्वपूर्ण खोज को 26 फरवरी, 2026 को दुनिया की अग्रणी वैज्ञानिक पत्रिकाओं में से एक, नेचर पोर्टफोलियो जर्नल ‘साइंटिफिक रिपोर्ट्स’ में प्रकाशित किया गया।

इस मछली की अनूठी विशेषताएँ:

यह नई प्रजाति और वंश (genus) अपने समूह की अन्य मछलियों की तुलना में सबसे असामान्य है, जिसके मुख्य कारण निम्नलिखित हैं:

  • खोपड़ी की अनुपस्थिति: इसमें खोपड़ी की छत (skull roof) का पूर्ण अभाव होता है। इसका मस्तिष्क ऊपरी तौर पर केवल त्वचा से ढका रहता है।
  • अंधापन: यह एक अंधी लोच (blind loach) है, जिसमें आँखों का पूरी तरह अभाव होता है।
  • रंग: जीवित अवस्था में इसका रंग गहरा लाल होता है।
  • शारीरिक बनावट: इसमें वे सभी लक्षण पाए जाते हैं जो भूमिगत जीवन से संबंधित होते हैं, जिन्हें वैज्ञानिक भाषा में ‘ट्रोग्लोमोर्फ़ीज़’ (troglomorphies) कहा जाता है।

नामकरण का अर्थ:

इस मछली का नाम गारो भाषा से लिया गया है:

  1. गिचक (Gitchak): इसका अर्थ है ‘लाल’, जो इसके चमकीले लाल रंग को दर्शाता है।
  2. नकाणा (nakana): यह दो शब्दों ‘ना-तोक’ (मछली) और ‘काणा’ (अंधी) से मिलकर बना है, जिसका अर्थ है ‘अंधी मछली’।

दुर्लभता और खोज का स्थान:

दुनिया भर में ज्ञात 300 से अधिक भूमिगत मछलियों में से 10% से भी कम एक्विफर्स (जल-भृतों) से पाई गई हैं। ऐसी मछलियाँ केवल दुर्लभ परिस्थितियों में या संयोगवश ही मिलती हैं। ‘साइंटिफिक रिपोर्ट्स’ के अनुसार, यह अंधी लोच भारत के असम में एक खुदे हुए कुएं में पाई गई थी।

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