भारत-फ्रांस दोहरा कराधान बचाव समझौता (DTAC) संशोधन
फ्रांस के राष्ट्रपति की हालिया भारत यात्रा के दौरान, 1992 के मूल ‘भारत-फ्रांस DTAC’ में संशोधन के लिए एक संशोधन प्रोटोकॉल (Amending Protocol) पर हस्ताक्षर किए गए हैं।
प्रमुख संशोधन और उनके प्रभाव:
- कैपिटल गेन्स (Capital Gains): अब कंपनी के शेयरों की बिक्री से होने वाले लाभ पर कर लगाने का पूर्ण अधिकार उस क्षेत्राधिकार (Jurisdiction) को होगा जहाँ वह कंपनी निवासी (Resident) है।
- MFN क्लॉज का हटना: ‘मोस्ट फेवर्ड नेशन’ (MFN) क्लॉज को हटा दिया गया है, जिससे इससे संबंधित पिछले सभी विवाद और अनिश्चितताएं समाप्त हो गई हैं।
- लाभांश (Dividend) कराधान में बदलाव: पहले 10% की एकल दर थी, जिसे अब बदलकर स्प्लिट रेट (Split Rate) कर दिया गया है:
- 5% टैक्स: यदि निवेशक के पास कंपनी की कम से कम 10% पूंजी है।
- 15% टैक्स: अन्य सभी मामलों में।
- तकनीकी सेवाओं के लिए शुल्क (FTS): इसकी परिभाषा को अब ‘भारत-अमेरिका DTAC’ के अनुरूप बनाया गया है।
- स्थायी प्रतिष्ठान (Permanent Establishment): ‘सर्विस पीई’ (Service PE) को जोड़कर स्थायी प्रतिष्ठान के दायरे को विस्तृत किया गया है।
BEPS (आधार क्षरण और लाभ स्थानांतरण) को समझना
संशोधन प्रोटोकॉल में BEPS के प्रावधानों को भी शामिल किया गया है, जो अंतरराष्ट्रीय कर चोरी को रोकने का एक वैश्विक ढांचा है।
BEPS क्या है?
यह बहुराष्ट्रीय कंपनियों (MNEs) द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली एक टैक्स प्लानिंग रणनीति है, जिसमें वे कर नियमों की खामियों का फायदा उठाकर अपने लाभ को कृत्रिम रूप से कम टैक्स वाले देशों (Tax Havens) में स्थानांतरित कर देती हैं।
OECD/G20 BEPS प्रोजेक्ट के दो मुख्य स्तंभ (Two Pillars):
| स्तंभ (Pillar) | मुख्य उद्देश्य |
| पिलर एक (Pillar One) | बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के कराधान अधिकारों को उन बाजारों (Market Jurisdictions) में पुन: आवंटित करना जहाँ वे वास्तव में व्यापार करती हैं। |
| पिलर दो (Pillar Two) | वैश्विक स्तर पर बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए 15% का न्यूनतम कॉर्पोरेट टैक्स (Global Minimum Corporate Tax) निर्धारित करना। |


