पश्चिमी हुलॉक गिब्बन-भारत में वानर (Ape) की एकमात्र प्रजाति
भारत में वानर (Ape) की एकमात्र प्रजाति, पश्चिमी हुलॉक गिब्बन (Hoolock hoolock), आज अपने अस्तित्व के सबसे कठिन दौर से गुजर रही है। असम के जोरहाट में स्थित होलोंगापार गिब्बन सैंक्चुअरी इस लुप्तप्राय प्रजाति का प्रमुख गढ़ है, लेकिन यहाँ भी मानवीय गतिविधियों और भौगोलिक बाधाओं ने इनके जीवन को संकट में डाल दिया है।
विखंडित होता आशियाना
वैज्ञानिकों और पर्यावरणविदों के लिए सबसे बड़ी चिंता का विषय जंगल का विखंडन (Fragmentation) है। ब्रिटिश काल की नॉर्थईस्ट फ्रंटियर रेलवे लाइन इस महत्वपूर्ण अभयारण्य को दो असमान हिस्सों में बांटती है। इसके अलावा, पूर्वोत्तर भारत के राज्यों—असम, मेघालय, अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर, नागालैंड और मिजोरम—में झूम खेती, वनों की कटाई और कृषि विस्तार ने इनके प्राकृतिक आवास को काफी सीमित कर दिया है।
चिंताजनक आंकड़े: 1 लाख से घटकर रह गए महज 5 हजार
एक समय में हुलॉक गिब्बन की आबादी लगभग 1,00,000 अनुमानित थी, जो अब घटकर 5,000 से भी कम रह गई है। शिकार और भूमि उपयोग में बदलाव के कारण इन्हें दुनिया के सबसे लुप्तप्राय प्राइमेट्स की सूची में शामिल किया गया है।
शारीरिक विशेषताएँ और व्यवहार
- बिना पूंछ वाले वानर: अन्य वानरों की तरह इनमें भी पूंछ नहीं होती। ये Hylobatidae कुल से संबंधित हैं और इन्हें ‘छोटे वानर’ (Small Apes) कहा जाता है।
- अनोखी बनावट: इनकी बाहें बहुत लंबी और पैर तुलनात्मक रूप से लंबे होते हैं। इनके शरीर पर मुलायम और घने बालों का कोट होता है।
- लैंगिक द्विरूपता: नर और मादा के शरीर के रंग अलग-अलग होते हैं, जिससे उन्हें आसानी से पहचाना जा सकता है।
- जीवनशैली: ये मुख्य रूप से फलभक्षी (Frugivorous) हैं और अपना अधिकांश समय ऊंचे पेड़ों पर बिताते हैं। ये सामाजिक रूप से ‘मोनोगेमस’ (एक ही साथी के साथ रहने वाले) होते हैं।
भौगोलिक सीमाएँ
पश्चिमी हुलॉक गिब्बन घने जंगलों में 8,202 फीट तक की ऊंचाई पर पाए जाते हैं। चिंदविन नदी इन्हें इनकी करीबी प्रजाति ‘पूर्वी हुलॉक गिब्बन’ (Hoolock leuconedys) से अलग करती है। हालांकि, नदी के उत्तरी उद्गम स्थल पर इन दोनों प्रजातियों का एक हाइब्रिड क्षेत्र भी मौजूद है।


