भारत विश्व का सबसे बड़ा चावल उत्पादक देश बना
भारत ने कृषि जगत में एक बड़ी उपलब्धि हासिल करते हुए चीन को पीछे छोड़ दिया है और अब वह दुनिया का सबसे बड़ा चावल उत्पादक देश बन गया है। केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने नई दिल्ली में इस ऐतिहासिक सफलता की घोषणा करते हुए बताया कि भारत का चावल उत्पादन अब नए रिकॉर्ड स्तर पर पहुँच गया है।
उत्पादन के आँकड़े: भारत बनाम चीन
कृषि मंत्री के अनुसार, भारत ने उत्पादन के मामले में अपने निकटतम प्रतिद्वंद्वी चीन पर बढ़त बना ली है। आँकड़े निम्नलिखित हैं:
| देश | चावल उत्पादन (मिलियन टन) |
| भारत | 150.18 |
| चीन | 145.28 |
भारत न केवल अपनी 1.4 बिलियन की विशाल आबादी (जो 2023 में चीन से आगे निकल गई थी) का पेट भर रहा है, बल्कि वैश्विक बाजारों में भी भारी मात्रा में चावल की आपूर्ति कर रहा है। पिछले एक दशक में भारत का चावल निर्यात दोगुना होकर 20 मिलियन मीट्रिक टन से अधिक हो गया है।
184 नई उन्नत किस्मों का तोहफा
उत्पादन क्षमता को और बढ़ाने के लिए, मंत्री ने भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) द्वारा विकसित 184 नई उन्नत किस्मों का अनावरण किया। इनमें शामिल हैं:
- अनाज: 122 किस्में
- दालें: 6 किस्में
- तिलहन: 13 किस्में
- अन्य: कपास (24), चारा फसलें (11), गन्ना (6), जूट और तंबाकू (1-1)।
चुनौतियां: “सफेद सोना” या “पानी की बर्बादी”?
जहाँ एक ओर रिकॉर्ड उत्पादन का जश्न मनाया जा रहा है, वहीं कृषि विशेषज्ञ और किसान भविष्य को लेकर चिंतित हैं। इस सफलता की एक बड़ी पर्यावरणीय कीमत चुकानी पड़ रही है:
- जल संकट: 1 किलोग्राम चावल उगाने में 3,000-4,000 लीटर पानी खर्च होता है, जो वैश्विक औसत से 20-60% अधिक है।
- भूजल का दोहन: पंजाब और हरियाणा जैसे राज्यों में किसान पूरी तरह भूजल पर निर्भर हैं। जलस्तर गिरने से किसानों को गहरे बोरवेल खोदने पड़ रहे हैं, जिसके लिए उन्हें भारी कर्ज लेना पड़ रहा है।
- सब्सिडी का जाल: चावल पर न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) में पिछले दशक में 70% की वृद्धि हुई है। मुफ्त बिजली और भारी सब्सिडी के कारण किसान कम पानी वाली फसलों (जैसे बाजरा या दलहन) की ओर नहीं जा पा रहे हैं।
विशेषज्ञों की राय
नीति निर्माताओं का मानना है कि भारत को अब “उत्पादन की मात्रा” (Quantity) के बजाय “उत्पादन की स्थिरता” (Sustainability) पर ध्यान देने की जरूरत है। यदि सिंचाई के तरीकों में बदलाव नहीं किया गया, तो आने वाले समय में चावल की खेती टिकाऊ नहीं रह जाएगी।


