भारतीय सेना के लगभग 33,000 सैनिकों को बसरा मेमोरियल में जोड़ा गया
अपनी मृत्यु के एक शताब्दी से भी अधिक समय बाद, प्रथम विश्व युद्ध के दौरान शहीद हुए भारतीय सेना के लगभग 33,000 सैनिक, जिन्हें इराक के एक स्मारक में व्यक्तिगत पहचान नहीं मिली थी, अब एक नई डिजिटल पहल के माध्यम से सम्मानित किए गए हैं। यह प्रयास बसरा मेमोरियल पर केंद्रित है, जहाँ ‘कॉमनवेल्थ वार ग्रेव्स कमीशन’ ने एक लंबे समय से चली आ रही भूल को सुधारने के लिए डिजिटल नाम पैनल पेश किए हैं।
- प्रथम विश्व युद्ध के दौरान, तत्कालीन ब्रिटिश साम्राज्य के यूरोप से बाहर सबसे बड़े सैन्य अभियानों में से एक ‘मेसोपोटामिया अभियान’ (Mesopotamia Campaign) में भारतीय सेना के हजारों जवान शहीद हुए थे।
- दशकों पुरानी उपेक्षा: इराक स्थित बसरा मेमोरियल पर ऐतिहासिक रूप से इन सैनिकों के नामों को व्यक्तिगत रूप से अंकित नहीं किया गया था। जबकि अन्य राष्ट्रमंडल (Commonwealth) सैनिकों के नाम वहां मौजूद थे, लगभग 33,000 भारतीय सैनिकों को अब तक वह व्यक्तिगत पहचान नहीं मिली थी।
- नई डिजिटल पहल: कॉमनवेल्थ वार ग्रेव्स कमीशन (CWGC) ने इस महीने की शुरुआत में एक नई डिजिटल पहल का अनावरण किया है। इसके माध्यम से डिजिटल नाम पैनल (digital name panels) लगाए गए हैं, ताकि लंबे समय से चली आ रही इस कमी को सुधारा जा सके।
- पूर्ण पहचान: पहली बार इन भारतीय सैनिकों के नाम उनके पद (Rank) और रेजीमेंट के साथ 46,000 अन्य राष्ट्रमंडल कर्मियों के साथ सामूहिक रूप से प्रदर्शित किए गए हैं।
मेसोपोटामिया अभियान का महत्व:
मेसोपोटामिया (वर्तमान इराक) का अभियान प्रथम विश्व युद्ध के सबसे कठिन अभियानों में से एक था। यहाँ भारतीय सैनिकों ने भीषण गर्मी, बीमारियों और कठिन भौगोलिक परिस्थितियों के बीच युद्ध लड़ा था। दसियों हज़ार सैनिकों ने अपने प्राणों की आहुति दी थी, और यह डिजिटल स्मारक उनकी वीरता को वह पहचान दे रहा है जिसके वे हकदार थे।


