वुल्फ सुपरमून, ब्लू मून और सुपरमून
साल 2026 की शुरुआत खगोलीय घटनाओं के शौकीनों के लिए बेहद खास रही। बीती 2 जनवरी की शाम को ‘वुल्फ सुपरमून’ अपनी पूरी चमक के साथ आसमान में दिखाई दिया। इस दौरान चांद न केवल सामान्य से अधिक बड़ा नजर आया, बल्कि इसकी रोशनी ने भी धरती को सराबोर कर दिया।
क्या है ‘वुल्फ मून’ का रहस्य?
जनवरी महीने की पहली पूर्णिमा (Full Moon) को पारंपरिक रूप से ‘वुल्फ मून’ कहा जाता है। पुराने समय में, जब आधुनिक कैलेंडर नहीं हुआ करते थे, तब लोग पंचांगों और लोककथाओं के आधार पर साल के समय का पता लगाते थे।
‘वुल्फ मून’ नाम सर्दियों की उन कहानियों से जुड़ा है जिनमें इन दिनों भेड़ियों के झुंडों की आवाजें अधिक सुनी जाती थीं। हालांकि, वैज्ञानिक रूप से चांद इस दौरान कोई विशेष व्यवहार नहीं करता, यह केवल एक पारंपरिक नाम है जो मौसम की पहचान कराता है।
खगोलीय घटना: क्यों होता है ‘सुपरमून’?
‘सुपरमून’ शब्द एक विशेष खगोलीय स्थिति को दर्शाता है। चंद्रमा पृथ्वी के चारों ओर एकदम गोल चक्कर नहीं लगाता, बल्कि उसका रास्ता अंडाकार (Elliptical) होता है। इस वजह से:
- पेरिगी (Perigee): वह बिंदु जब चंद्रमा पृथ्वी के सबसे करीब होता है।
- अपोजी (Apogee): वह बिंदु जब चंद्रमा पृथ्वी से सबसे दूर होता है।
जब पूर्णिमा (Full Moon) की स्थिति तब बनती है जब चांद अपनी कक्षा में ‘पेरिगी’ के पास होता है, तो उसे सुपरमून कहा जाता है।
सामान्य चांद से कितना अलग?
वैज्ञानिकों के अनुसार, एक सुपरमून सामान्य पूर्णिमा के चांद की तुलना में:
- 15% अधिक चमकदार दिखाई देता है।
- आकार में 30% बड़ा नजर आता है।
यही कारण है कि 2 जनवरी की रात चांद की चमक सामान्य दिनों से काफी ज्यादा थी, जो फोटोग्राफी और चांद को निहारने वालों के लिए एक बेहतरीन अनुभव था।
अब 31 मई को दिखेगा ‘ब्लू मून’
अगर आप इस खगोलीय नजारे को देखने से चूक गए हैं, तो साल के कैलेंडर पर अपनी नजर बनाए रखें। इस साल 31 मई को एक अतिरिक्त पूर्णिमा होगी, जिसे ‘ब्लू मून’ कहा जाता है। ब्लू मून का मतलब चांद का नीला होना नहीं है, बल्कि एक ही कैलेंडर महीने में होने वाली दूसरी पूर्णिमा को यह नाम दिया जाता है।


