ऑपरेशन एब्सोल्यूट रिजॉल्व: वेनेजुएला पर अमेरिकी हमले की कानूनी वैधता पर उठे सवाल

3 जनवरी, 2026 को अमेरिकी सेना द्वारा वेनेजुएला में किए गए ‘ऑपरेशन एब्सोल्यूट रिजॉल्व’ ने पूरी दुनिया में एक नई कानूनी और कूटनीतिक बहस छेड़ दी है। जहाँ राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप इसे “पश्चिमी गोलार्ध की सुरक्षा” बता रहे हैं, वहीं अंतरराष्ट्रीय कानून के विशेषज्ञों ने इसे संयुक्त राष्ट्र (UN) के चार्टर का घोर उल्लंघन और ‘अमेरिकी साम्राज्यवाद’ का आधुनिक स्वरूप करार दिया है।


अंतरराष्ट्रीय कानून और UN चार्टर का उल्लंघन

विशेषज्ञों के अनुसार, वेनेजुएला की संप्रभुता पर यह हमला 1945 के संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुच्छेद 2(4) का सीधा उल्लंघन है। यह अनुच्छेद स्पष्ट रूप से सदस्य देशों को किसी अन्य देश की क्षेत्रीय अखंडता या राजनीतिक स्वतंत्रता के खिलाफ सैन्य बल के उपयोग से रोकता है।

  • संप्रभुता का सम्मान: अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत, किसी भी देश को दूसरे देश के राष्ट्राध्यक्ष को उसके क्षेत्र से सैन्य कार्रवाई के जरिए गिरफ्तार करने का अधिकार नहीं है।
  • ऐतिहासिक संदर्भ: इस हमले की तुलना 2003 के इराक आक्रमण से की जा रही है, जहाँ “लोकतंत्र के निर्यात” और “सामूहिक विनाश के हथियारों” के नाम पर एक संप्रभु राष्ट्र को अस्थिर कर दिया गया था।
‘डॉन-रो’ नीति के पीछे के असली मकसद

आलोचकों का तर्क है कि निकोलस मादुरो पर नशीली दवाओं की तस्करी के आरोप केवल एक बहाना हैं। राष्ट्रपति ट्रंप के इस ‘डॉन-रो’ दृष्टिकोण के पीछे तीन गहरे रणनीतिक लक्ष्य दिखाई देते हैं:

  1. वर्चस्व की बहाली: पश्चिमी गोलार्ध में अमेरिकी प्रभुत्व को फिर से स्थापित करना और मोनरो सिद्धांत को नई आक्रामकता के साथ लागू करना।
  2. चीनी और रूसी प्रभाव पर अंकुश: लातिन अमेरिका में बढ़ती विदेशी शक्तियों (विशेषकर चीन और रूस) की मौजूदगी को पूरी तरह समाप्त करना।
  3. तेल संसाधनों पर नजर: वेनेजुएला के पास दुनिया का सबसे बड़ा प्रमाणित तेल भंडार है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस सैन्य हस्तक्षेप का एक मुख्य उद्देश्य ऊर्जा संसाधनों पर अमेरिकी नियंत्रण सुनिश्चित करना है।
आत्मरक्षा का तर्क बनाम साम्राज्यवादी एजेंडा

व्हाइट हाउस इस हमले को “आत्मरक्षा” के रूप में पेश करने की कोशिश कर रहा है। ट्रंप प्रशासन का दावा है कि मादुरो एक “नारको-आतंकवादी संगठन” का नेतृत्व कर रहे थे जो अमेरिका के लिए एक सीधा खतरा था।

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