भारत के 87% हिस्से पर अब ‘डॉप्लर रडार’ की नज़र

संसद के शीतकालीन सत्र के दौरान पृथ्वी विज्ञान राज्य मंत्री जितेंद्र सिंह ने देश की मौसम निगरानी प्रणाली को लेकर महत्वपूर्ण जानकारी साझा की। उन्होंने बताया कि भारत अब मौसम के सटीक पूर्वानुमान की दिशा में तेज़ी से आगे बढ़ रहा है और वर्तमान में देश का 87% हिस्सा डॉप्लर वेदर रडार (DWR) के कवरेज क्षेत्र में आ चुका है।

संसद में पेश किए गए मुख्य आंकड़े

एक सवाल के जवाब में मंत्री जितेंद्र सिंह ने बताया कि:

  • कुल रडार: वर्तमान में देश भर में 47 डॉप्लर वेदर रडार काम कर रहे हैं।
  • कवरेज: ये रडार देश के कुल भौगोलिक क्षेत्र का 87% हिस्सा कवर करते हैं।
  • आगामी योजना: सरकार का लक्ष्य जल्द ही शेष बचे क्षेत्रों में भी ये रडार लगाकर शत-प्रतिशत कवरेज हासिल करना है।

कैसे काम करती है यह तकनीक?

डॉप्लर रडार सामान्य रडार से अधिक उन्नत होते हैं क्योंकि ये न केवल बादलों की स्थिति, बल्कि उनकी गति और दिशा को भी भांप लेते हैं।

  1. रेडियो तरंगों का खेल: रडार का एंटीना रेडियो तरंगों (Energy Beam) को वातावरण में छोड़ता है।
  2. परावर्तन (Reflection): जब ये किरणें बारिश की बूंदों या बर्फ के कणों से टकराती हैं, तो ऊर्जा वापस रडार की ओर रिफ्लेक्ट होती है।
  3. दूरी और आकार का आकलन: किरण के वापस आने में लगे समय से ‘दूरी’ का पता चलता है, जबकि वापस आई ऊर्जा की मात्रा से ‘टारगेट’ (बादल या बारिश) के आकार का पता चलता है।

विभिन्न फ्रीक्वेंसी और उनके उपयोग

भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) चक्रवात और भारी बारिश जैसी गंभीर स्थितियों पर नज़र रखने के लिए तीन प्रमुख बैंड्स का उपयोग करता है:

रडार बैंडमुख्य उपयोग
X-बैंडतड़ितझंझा (Thunderstorm) और बिजली गिरने का पता लगाने के लिए।
C-बैंडचक्रवातों (Cyclones) की सटीक ट्रैकिंग के लिए।
S-बैंडलंबी दूरी (लगभग 500 किमी तक) की निगरानी और भारी वर्षा मापने के लिए।

विज्ञान के पीछे का आधार: ‘डॉप्लर प्रभाव’

यह पूरी तकनीक 19वीं सदी के ऑस्ट्रियाई भौतिक विज्ञानी क्रिश्चियन डॉप्लर द्वारा खोजे गए ‘डॉप्लर प्रभाव’ पर आधारित है। उदाहरण के लिए: जैसे हमारे पास आती हुई ट्रेन की सीटी की आवाज़ तेज़ (High Pitch) सुनाई देती है क्योंकि ध्वनि तरंगें कंप्रेस (फेज शिफ्ट) हो जाती हैं, और दूर जाती ट्रेन की आवाज़ कम सुनाई देती है। ठीक इसी सिद्धांत का उपयोग करके रडार यह पता लगाता है कि बादलों का समूह हमारी ओर आ रहा है या हमसे दूर जा रहा है।

यह तकनीक मौसम वैज्ञानिकों को चक्रवात और अचानक आने वाली आपदाओं के समय सटीक चेतावनी जारी करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है, जिससे जान-माल के नुकसान को कम करने में मदद मिलती है।

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