ट्रंप ने डिएगो गार्सिया के बहाने ग्रीनलैंड पर कब्जे का इरादा दोहराया
अमेरिका के राष्ट्रपति के रूप में अपने दूसरे कार्यकाल की पहली वर्षगांठ के अवसर पर, डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर ग्रीनलैंड को अमेरिकी नियंत्रण में लेने की अपनी इच्छा जाहिर की है। इस बार ट्रंप ने अपने इस दावे के पक्ष में एक नया तर्क पेश किया है—डिएगो गार्सिया और चागोस द्वीप समूह का मामला।
क्या है पूरा मामला?
अक्टूबर 2024 में, ब्रिटेन सरकार ने हिंद महासागर में स्थित रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण चागोस द्वीप समूह की संप्रभुता मॉरीशस को सौंपने का ऐतिहासिक निर्णय लिया था। इस समझौते के तहत:
- संप्रभुता: चागोस द्वीपों पर अब मॉरीशस का अधिकार होगा।
- सैन्य बेस: डिएगो गार्सिया (सबसे बड़ा द्वीप) पर स्थित महत्वपूर्ण सैन्य बेस का नियंत्रण ब्रिटेन के पास ही रहेगा।
- लीज: ब्रिटेन इस बेस के लिए मॉरीशस को 99 वर्षों तक किराया (लीज) देगा।
ट्रंप ने इस समझौते को ब्रिटेन की “बड़ी बेवकूफी” बताते हुए कहा कि यह राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा है। उन्होंने तर्क दिया कि जिस तरह ब्रिटेन अपनी जमीन छोड़ रहा है, वही कारण ग्रीनलैंड के अधिग्रहण को और भी जरूरी बना देते हैं।
डिएगो गार्सिया का महत्व
डिएगो गार्सिया हिंद महासागर के बीचों-बीच स्थित है और मालदीव से लगभग 500 किमी दक्षिण में है। इसका रणनीतिक महत्व इस प्रकार है:
- चीन पर नजर: यहाँ से अमेरिका मलक्का जलडमरूमध्य (Malacca Strait) पर नजर रख सकता है, जो वैश्विक व्यापार और चीन की सप्लाई लाइन के लिए बेहद अहम है।
- मध्य पूर्व तक पहुंच: खाड़ी देशों और पश्चिम एशिया में अमेरिकी सैन्य उपस्थिति के लिए यह बेस रीढ़ की हड्डी माना जाता है।
- ऑपरेशनल बेस: यह बेस 1986 से पूरी तरह सक्रिय है और यहाँ से बड़ी सैन्य गतिविधियों का संचालन किया जाता है।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
चागोस द्वीप समूह में 58 द्वीप शामिल हैं। 18वीं सदी के अंत में फ्रांसीसियों ने यहाँ नारियल के बागानों में काम करने के लिए भारत और अफ्रीका से गुलामों को लाया था। 1814 में यह ब्रिटेन के कब्जे में आया। 1965 में ब्रिटेन ने इसे ‘ब्रिटिश हिंद महासागर क्षेत्र’ (BIOT) घोषित किया। हालांकि मॉरीशस 1968 में आजाद हो गया, लेकिन ब्रिटेन ने चागोस को अपने पास ही रखा ताकि वहां सैन्य बेस बनाया जा सके। इस प्रक्रिया में वहां के निवासियों को जबरन मॉरीशस और सेशेल्स में बसाया गया था।
अगला कदम: मॉरीशस लंबे समय से इसे ‘अवैध कब्जा’ बताता रहा है। अब ट्रंप के ताजा बयानों ने इस अंतरराष्ट्रीय समझौते और ग्रीनलैंड के मुद्दे पर नई बहस छेड़ दी है।


