सुप्रीम कोर्ट ने चुनावों के दौरान NOTA विकल्प की प्रभावशीलता पर सवाल उठाए
24 फरवरी 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने चुनावों के दौरान नोटा (NOTA – None of the Above) विकल्प की प्रभावशीलता पर सवाल उठाए। कोर्ट ने टिप्पणी की कि इसके पेश होने के एक दशक बाद भी, राजनीतिक दलों द्वारा उम्मीदवारों के चयन पर इसका कोई खास प्रभाव नहीं पड़ा है।
यहाँ इस मामले और नोटा से संबंधित विस्तृत जानकारी दी गई है:
विवाद का मुख्य बिंदु
- याचिका: ‘विधि सेंटर फॉर लीगल पॉलिसी’ द्वारा दायर एक जनहित याचिका (PIL) में निर्विरोध (unopposed) उम्मीदवारों के सीधे चुने जाने की प्रथा को चुनौती दी गई है।
- तर्क: याचिकाकर्ता के अनुसार, निर्विरोध चुनाव मतदाताओं के चुनने के अधिकार को खत्म करता है और उन्हें नोटा (NOTA) के विकल्प का उपयोग करने से भी रोकता है।
- केंद्र और चुनाव आयोग का रुख: दोनों ने याचिका का विरोध किया है। केंद्र का कहना है कि 1991 के बाद से निर्विरोध चुनाव के मामले नगण्य हैं। चुनाव आयोग ने स्पष्ट किया कि 2013 के बाद से ऐसा कोई चुनाव नहीं हुआ जहाँ नोटा को बहुमत मिला हो।
नोटा (NOTA) के बारे में महत्वपूर्ण तथ्य
- शुरुआत: 2013 में सर्वोच्च न्यायालय ने PUCL मामले में दिए गए अपने फैसले के माध्यम से चुनाव आयोग को इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (EVM) में नोटा विकल्प शामिल करने का निर्देश दिया था।
- पहला कार्यान्वयन: इसे पहली बार 2013 में छत्तीसगढ़, मिजोरम, राजस्थान, मध्य प्रदेश और दिल्ली के विधानसभा चुनावों में लागू किया गया था।
- नियम 49-O: 2013 से पहले, यदि कोई मतदाता किसी भी उम्मीदवार को वोट नहीं देना चाहता था, तो उसे ‘चुनाव संचालन नियम’ की धारा 49-O के तहत अपनी पहचान बताकर एक रजिस्टर में अपनी असहमति दर्ज करानी पड़ती थी (जिसमें गोपनीयता नहीं रहती थी)।
नोटा की वर्तमान कानूनी स्थिति
भारत में नोटा का प्रभाव केवल प्रतीकात्मक (symbolic) है:
- विजेता का निर्धारण: यदि 100 में से 99 वोट नोटा को मिलते हैं और 1 वोट किसी उम्मीदवार को, तब भी वह उम्मीदवार ही विजेता घोषित किया जाएगा।
- कोई पद नहीं: नोटा कोई व्यक्ति नहीं है और यह सीट नहीं भर सकता। जिस उम्मीदवार को वैध मतों में से सबसे अधिक वोट मिलते हैं, उसे ही विजयी घोषित किया जाता है, चाहे नोटा के वोटों की संख्या कितनी भी हो।
- धारा 53(2): जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 53(2) बिना किसी विरोध वाले चुनाव में उम्मीदवारों के सीधे निर्वाचन का प्रावधान करती है।
क्या आप जानते हैं? महाराष्ट्र और हरियाणा जैसे कुछ राज्यों के राज्य चुनाव आयोगों ने स्थानीय निकाय चुनावों के लिए नियम बनाया है कि यदि नोटा को सबसे अधिक वोट मिलते हैं, तो पुनर्मतदान (re-poll) कराया जाएगा। हालांकि, लोकसभा और विधानसभा चुनावों के लिए यह नियम लागू नहीं है।


