सुप्रीम कोर्ट ने पहली बार पैसिव यूथेनेशिया फ्रेमवर्क लागू किया
उच्चतम न्यायालय ने 11 मार्च को पैसिव यूथेनेशिया (निष्क्रिय इच्छामृत्यु) ढांचे के पहले अनुप्रयोग के रूप में, 32 वर्षीय हरीश राणा के जीवन-रक्षक उपचार को हटाने की अनुमति दे दी है। हरीश 2013 में गिरने से लगी सिर की चोटों के कारण पिछले 13 वर्षों से ‘परसिस्टेंट वेजीटेटिव स्टेट’ (PST) में थे।
बेंच ने निर्देश दिया कि “आवेदक को दी जा रही नैदानिक रूप से सहायता प्राप्त पोषण (Clinically Assisted Nutrition) सहित चिकित्सा उपचार को वापस ले लिया जाएगा और रोक दिया जाएगा”।
प्रमुख कानूनी प्रावधान और प्रक्रिया
1. ‘कॉमन कॉज’ (Common Cause) ढांचा:
उपचार वापस लेने की अनुमति दो मेडिकल बोर्डों द्वारा मूल्यांकन के बाद दी जाती है:
- प्राथमिक मेडिकल बोर्ड: उपचार करने वाले अस्पताल का बोर्ड।
- द्वितीयक मेडिकल बोर्ड: इसमें एक बाहरी नामित व्यक्ति शामिल होता है।दोनों बोर्डों को यह प्रमाणित करना अनिवार्य है कि उपचार जारी रखने से कोई चिकित्सा उद्देश्य पूरा नहीं हो रहा है।
2. सक्रिय बनाम निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Active vs Passive Euthanasia):
| श्रेणी | विवरण | भारत में स्थिति |
| सक्रिय इच्छामृत्यु (Assisted Dying) | घातक इंजेक्शन के माध्यम से जानबूझकर मृत्यु का कारण बनना। | अवैध: यह ‘भारतीय न्याय संहिता’ के तहत आपराधिक दायित्व और ‘आपराधिक मानव वध’ की श्रेणी में आता है। |
| निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) | जीवन-रक्षक उपचार को रोकना या वापस लेना ताकि बीमारी अपना स्वाभाविक रूप ले सके। | वैध: कुछ शर्तों के साथ उच्चतम न्यायालय द्वारा अनुमति प्राप्त। |
संवैधानिक और विधायी संदर्भ
- अनुच्छेद 21: उच्चतम न्यायालय ने “जीवन के अधिकार” की व्याख्या करते हुए इसमें “गरिमा के साथ जीने का अधिकार” भी शामिल किया है।
- न्यायालय का तर्क: उन रोगियों के लिए जो लाइलाज रूप से बीमार हैं या परसिस्टेंट वेजीटेटिव स्टेट में हैं, संविधान इनवेसिव या व्यर्थ चिकित्सा हस्तक्षेप के माध्यम से जीवित न रखे जाने के विकल्प की रक्षा करता है।
- कानून की आवश्यकता: बेंच ने यह भी नोट किया कि भारत में ‘एंड-ऑफ-लाइफ केयर’ (जीवन के अंतिम समय की देखभाल) पर कोई व्यापक कानून नहीं है और केंद्र सरकार से इस मुद्दे पर कानून बनाने पर विचार करने का आग्रह किया है।


