वैज्ञानिकों ने ‘चन्द्रमा से लायी गई मिट्टी’ में चना उगाया

बाह्य-अंतरिक्ष कृषि (extraterrestrial agriculture) के क्षेत्र को विकसित करने में जुटे वैज्ञानिकों ने सिम्युलेटेड (कृत्रिम) चंद्र मिट्टी से बने मिश्रण में चने उगाने में सफलता प्राप्त की है। यह चंद्रमा के लंबी अवधि के मिशनों पर जाने वाले अंतरिक्ष यात्रियों को अपना भोजन स्वयं तैयार करने में सक्षम बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम है।

शोधकर्ताओं ने बताया कि ‘मून डस्ट’ (चंद्र धूल) के मिट्टी के मिश्रण में उपयोग योग्य चने उगाए गए। यह मिट्टी आधी सदी से भी पहले नासा के अपोलो मिशन के दौरान लाए गए चंद्र नमूनों के मॉडल पर आधारित थी।

मुख्य बिंदु:

  • किस्म और स्थान: ‘माइल्स’ (Myles) नामक चने की किस्म को टेक्सास एएंडएम यूनिवर्सिटी (Texas A&M University) में एक जलवायु-नियंत्रित विकास कक्ष (growth chamber) में उगाया गया।
  • प्रक्रिया: बीजों पर लाभकारी कवक (fungi) का लेप लगाया गया और उन्हें सिम्युलेटेड चंद्र मिट्टी और वर्मीकम्पोस्ट के मिश्रण में रोपा गया।
  • परिणाम: चने के पौधे 75% तक चंद्र मिट्टी वाले मिश्रण में सफलतापूर्वक बढ़े। हालांकि, जैसे-जैसे चंद्र मिट्टी (जिसे रेगोलिथ कहा जाता है) का प्रतिशत बढ़ाया गया, पैदावार में कमी आई, लेकिन चने का आकार स्थिर रहा।
  • चुनौती: शत-प्रतिशत (100%) चंद्र मिट्टी में लगाए गए बीज फूल और बीज पैदा करने में विफल रहे और जल्दी ही सूख गए। 

यह शोध क्यों महत्वपूर्ण है?

चने प्रोटीन और अन्य आवश्यक पोषक तत्वों से भरपूर होते हैं, जो उन्हें अंतरिक्ष में फसल उत्पादन के लिए एक मजबूत विकल्प बनाते हैं।

चंद्रमा पर रहने वाले लोगों के लिए स्थानीय खाद्य स्रोत महत्वपूर्ण माना जाता है, क्योंकि पृथ्वी से सारा भोजन ले जाना अव्यावहारिक है। इसके अलावा, ये पौधे ऑक्सीजन पैदा करने और भविष्य की मानव बस्तियों के लिए जीवन-रक्षक प्रणालियों को बेहतर बनाने में भी मदद करेंगे।

चंद्र मिट्टी मूल रूप से कुचली हुई चट्टानें और धूल है, जो अरबों वर्षों के उल्कापिंडों के टकराने से बनी है। यह अक्सर नुकीली और कांच जैसी होती है। हालांकि इसमें पौधों के विकास के लिए आवश्यक खनिज होते हैं, लेकिन यह पृथ्वी की उपजाऊ मिट्टी के विपरीत अकार्बनिक और प्रतिकूल होती है। पिछले अध्ययनों से पता चला है कि खाद या अन्य जैविक पदार्थों को मिलाकर पौधों को चंद्र मृदा के नमूनों में उगाया जा सकता है।

Source: The Hindu & Nature

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