लोकसभा अध्यक्ष को हटाने की संवैधानिक प्रक्रिया
10 फरवरी को लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के खिलाफ लाया गया अविश्वास प्रस्ताव भारतीय संसदीय इतिहास की उन गिनी-चुनी घटनाओं में से एक है, जो संवैधानिक और प्रक्रियात्मक दृष्टि से बेहद जटिल हैं।
लोकसभा अध्यक्ष को हटाने की संवैधानिक प्रक्रिया
संविधान का अनुच्छेद 94(c) लोकसभा अध्यक्ष (Speaker) और उपाध्यक्ष (Deputy Speaker) को पद से हटाने का मार्ग प्रशस्त करता है। इसकी प्रक्रिया काफी सख्त है ताकि इस संवैधानिक पद की गरिमा और स्वतंत्रता बनी रहे।
प्रमुख चरण और शर्तें:
| चरण | विवरण |
| नोटिस की अवधि | कम से कम 14 दिनों का लिखित नोटिस महासचिव (Secretary-General) को देना अनिवार्य है। |
| समर्थन | प्रस्ताव पेश करने के लिए कम से कम दो सदस्यों का समर्थन आवश्यक है, और सदन में प्रक्रिया शुरू करने के लिए कम से कम 50 सदस्यों का खड़ा होकर समर्थन करना (कोरम) जरूरी है। |
| पारित होने का बहुमत | इसे लोकसभा के “तत्कालीन समस्त सदस्यों के बहुमत” (Majority of all the then members) द्वारा पारित होना चाहिए। इसे ‘प्रभावी बहुमत’ (Effective Majority) भी कहा जाता है। |
नोट: जब अध्यक्ष को हटाने का प्रस्ताव विचाराधीन होता है, तो वे सदन की अध्यक्षता नहीं कर सकते, हालांकि उन्हें सदन में बोलने और कार्यवाही में भाग लेने का अधिकार होता है।
ऐतिहासिक संदर्भ: अब तक के मामले
भारतीय संसद के इतिहास में अब तक केवल तीन बार ऐसे प्रस्ताव आए हैं, और दिलचस्प बात यह है कि किसी भी मामले में अध्यक्ष को अपना पद नहीं खोना पड़ा:
- 1954: जी.वी. मावलंकर (प्रथम लोकसभा अध्यक्ष) के खिलाफ।
- 1966: हुकम सिंह के खिलाफ।
- 1987: बलराम जाखड़ के खिलाफ।


