रूट विल्ट बीमारी के कारण नारियल की खेती को भारी नुकसान

भारत के दक्षिणी राज्यों—कर्नाटक, तमिलनाडु और केरल—में नारियल के बागान एक गंभीर संकट से जूझ रहे हैं। ‘फाइटोप्लाज्मा’ (Phytoplasma) नामक जीवाणु से होने वाली ‘रूट विल्ट’ (Root Wilt) बीमारी ने पारंपरिक नारियल उत्पादक क्षेत्रों के एक बड़े हिस्से को बर्बाद कर दिया है।

क्या है रूट विल्ट बीमारी?

रूट विल्ट एक कमजोर करने वाली स्थिति है जिसे गैर-घातक (non-lethal) बीमारी के रूप में वर्गीकृत किया गया है। इसकी मुख्य विशेषताएं इस प्रकार हैं:

  • रोगजनक: यह फाइटोप्लाज्मा के कारण होता है, जो फ्लोएम-प्रतिबंधित (phloem-restricted) बैक्टीरिया हैं। ये पौधे की वाहिकाओं (फ्लोएम) में रहकर पोषक तत्वों के प्रवाह को बाधित करते हैं।
  • वाहक: यह बीमारी मुख्य रूप से कीड़ों (जैसे लेसहूपर्स) के माध्यम से एक पेड़ से दूसरे पेड़ तक फैलती है।
  • इतिहास: इसे सबसे पहले 150 साल पहले केरल के एराट्टुपेट्टा में पहचाना गया था।

150 वर्षों का शोध, फिर भी इलाज नहीं

कायमकुलम स्थित सेंट्रल प्लांटेशन क्रॉप्स रिसर्च इंस्टीट्यूट (CPCRI) में डेढ़ सदी से अधिक समय से लगातार वैज्ञानिक अनुसंधान चल रहा है। इसके बावजूद, अभी तक इस बीमारी का कोई सटीक और स्थायी इलाज नहीं खोजा जा सका है। हालांकि यह बीमारी पुरानी है, लेकिन हाल के वर्षों में हवा और बागानों के अनियंत्रित विस्तार के कारण इसके फैलने की गति बहुत तेज हो गई है, जिससे किसान असमंजस में हैं।

भारतीय अर्थव्यवस्था और नारियल का महत्व

नारियल को ‘कल्पवृक्ष’ (स्वर्ग का पेड़) कहा जाता है क्योंकि इसका हर हिस्सा उपयोगी होता है। इसकी आर्थिक अहमियत को इन आंकड़ों से समझा जा सकता है:

  • उत्पादन: कर्नाटक, तमिलनाडु और केरल मिलकर भारत के कुल नारियल उत्पादन का लगभग 82-83% हिस्सा बनाते हैं।
  • बाजार समर्थन: भारत सरकार खोपरा (सूखा नारियल जिससे तेल निकलता है) के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) घोषित करती है।
  • नियामक निकाय: कोच्चि स्थित कोकोनट डेवलपमेंट बोर्ड (CDB) इस फसल के विकास और किसानों के हितों की रक्षा के लिए काम करता है।
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