NHRC ने कालबेलिया समुदाय के लिए कब्रिस्तान की मांग पर नोटिस जारी किया

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) ने 29 जनवरी (2026) को राजस्थान सरकार को एक नोटिस जारी किया है। यह नोटिस बाड़मेर जिले में कालबेलिया समुदाय द्वारा अपने परिजनों के दफन के लिए एक निर्धारित स्थान की मांग को लेकर किए गए हालिया विरोध प्रदर्शनों के बाद आया है।

विवाद का मुख्य कारण:

  • परंपरा और समस्या: कालबेलिया समुदाय ‘नाथ परंपरा’ का पालन करता है, जिसके तहत मृतकों का दाह संस्कार करने के बजाय उन्हें दफनाया जाता है।
  • प्रशासनिक उपेक्षा: अन्य समुदायों के लिए निर्धारित श्मशान या कब्रिस्तान के विपरीत, प्रशासन द्वारा कालबेलिया समुदाय के लिए अब तक कोई विशेष कब्रिस्तान (Burial Ground) आवंटित नहीं किया गया है।

कालबेलिया समुदाय: एक परिचय

  • इतिहास: कालबेलिया समुदाय की जड़ें 12वीं शताब्दी में राजस्थान के थार रेगिस्तान से जुड़ी हैं।
  • भाषा: इनके द्वारा बोली जाने वाली भाषा को ‘सपेरा’ कहा जाता है।
  • व्यवसाय का विकास: कभी पेशेवर सांप पकड़ने वाले रहे कालबेलिया लोग आज अपने पूर्व व्यवसाय को संगीत और नृत्य के माध्यम से जीवंत रखते हैं, जो अब नए और रचनात्मक रूपों में विकसित हो रहा है।

सांस्कृतिक महत्व और यूनेस्को की मान्यता

कालबेलिया लोक संगीत और नृत्य को इसकी अद्वितीयता के कारण 2010 में यूनेस्को (UNESCO) की ‘मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत’ (Intangible Cultural Heritage of Humanity) की प्रतिनिधि सूची में शामिल किया गया था।

  • नृत्य शैली: काले रंग के घाघरे पहनकर महिलाएं सांप की गति की तरह थिरकती और घूमती हैं।
  • वाद्ययंत्र: नृत्य के दौरान पुरुष ‘पुंगी’ (सांप पकड़ने वाला पारंपरिक वाद्ययंत्र) और ‘खंजरी’ (ताल वाद्य) बजाते हैं।
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