गृह मंत्रालय ने ‘निर्धन कैदियों को सहायता’ योजना के नियमों में बदलाव किया
केंद्रीय गृह मंत्रालय (MHA) ने जेलों में बंद गरीब कैदियों को राहत देने के लिए अपनी ‘निर्धन कैदियों को सहायता (Support to Poor Prisoners)’ योजना के दिशा-निर्देशों में महत्वपूर्ण संशोधन किए हैं। राज्यों की धीमी प्रतिक्रिया को देखते हुए, मंत्रालय ने अब वरिष्ठ अधिकारियों की भागीदारी अनिवार्य कर दी है और पूरी प्रक्रिया के लिए एक सख्त समय-सीमा निर्धारित की है।
योजना का उद्देश्य
2023 में शुरू की गई इस योजना का लक्ष्य उन कैदियों की मदद करना है जो केवल निम्नलिखित कारणों से जेल में बंद हैं:
- अदालत द्वारा लगाए गए जुर्माने का भुगतान न कर पाना।
- जमानत (Bail) के लिए जरूरी वित्तीय गारंटी देने में असमर्थता।
नया प्रशासनिक ढांचा और प्रक्रिया
संशोधित फ्रेमवर्क के अनुसार, अब प्रत्येक जिले में एक ‘अधिकार प्राप्त समिति’ (Empowered Committee) मामलों की जांच और मंजूरी देगी।
- समिति के सदस्य: जिला कलेक्टर का एक प्रतिनिधि और संबंधित जेल के प्रभारी जज (जिन्हें जिला जज द्वारा नामित किया जाएगा)।
- त्वरित कार्रवाई: यदि कोई दोषी कैदी जुर्माना न भरने के कारण जेल में है, तो जेल अधीक्षक को एक सप्ताह के भीतर जिला विधिक सेवा प्राधिकरण (DLSA) के सचिव को सूचित करना अनिवार्य होगा।
- वित्तीय सहायता: DLSA सचिव की सिफारिश पर समिति ₹25,000 तक की वित्तीय सहायता मंजूर कर सकती है, जिसे कैदी की रिहाई के लिए सीधे अदालत में जमा किया जाएगा।
योजना के दायरे से बाहर (Ineligibility)
गृह मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि यह योजना सभी कैदियों के लिए नहीं है। निम्नलिखित गंभीर अपराधों के आरोपियों को सहायता नहीं दी जाएगी:
- विशेष अधिनियम: भ्रष्टाचार निवारण (PCA), धन शोधन (PMLA), नारकोटिक्स (NDPS) और UAPA के तहत मामले।
- जघन्य अपराध: आतंकवाद, राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरा, दहेज हत्या, बलात्कार और मानव तस्करी।
- POCSO अधिनियम: बच्चों के खिलाफ यौन अपराधों के आरोपी।
संशोधन की आवश्यकता क्यों?
मंत्रालय ने पाया कि कई राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में इस योजना का क्रियान्वयन संतोषजनक नहीं था। नई गाइडलाइंस का उद्देश्य जवाबदेही तय करना है ताकि वित्तीय अक्षमता के कारण किसी भी पात्र कैदी की स्वतंत्रता बाधित न हो।


