मध्य प्रदेश और असम ने द्विपक्षीय ‘वन्यजीव आदान-प्रदान समझौते’ पर हस्ताक्षर किए

भारत में वन्यजीव संरक्षण की दिशा में एक बड़ा मील का पत्थर स्थापित करते हुए, मध्य प्रदेश और असम सरकारों ने एक द्विपक्षीय ‘वन्यजीव आदान-प्रदान समझौते’ पर हस्ताक्षर किए हैं। इस समझौते का मुख्य उद्देश्य पारिस्थितिक संतुलन को बहाल करना और उन प्रजातियों को पुनर्जीवित करना है जो अपने मूल क्षेत्रों से विलुप्त हो चुकी हैं।

आदान-प्रदान का खाका: कौन सा राज्य क्या देगा?

इस अंतर-राज्यीय समझौते के तहत दोनों राज्यों के बीच जानवरों का एक बड़ा समूह भेजा जाएगा:

भेजने वाला राज्यप्राप्त करने वाला राज्यवन्यजीव और संख्या
असममध्य प्रदेश50 जंगली पानी की भैंसें (3 वर्षों में), 1 जोड़ा एक सींग वाला गैंडा, 3 किंग कोबरा
मध्य प्रदेशअसम1 जोड़ा बाघ (Tigers), 6 मगरमच्छ

कान्हा टाइगर रिजर्व में फिर गूँजेगी ‘जंगली भैंसों’ की दस्तक

इस पूरे प्रोजेक्ट का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा जंगली पानी की भैंस (Bubalus arnee) का पुनरुद्धार है। मध्य प्रदेश में यह प्रजाति लगभग 100 साल पहले विलुप्त हो गई थी।

  • प्रक्रिया: अगले तीन वर्षों में असम के काजीरंगा और मानस नेशनल पार्क से 50 भैंसों को अलग-अलग समूहों में लाया जाएगा।
  • आवास: शुरुआत में इन्हें अनुकूलन (Acclimatization) के लिए भोपाल के वन विहार नेशनल पार्क में रखा जाएगा, जिसके बाद इन्हें उनके ऐतिहासिक निवास स्थान कान्हा टाइगर रिजर्व में छोड़ दिया जाएगा।

कान्हा ही क्यों? (WII की रिपोर्ट)

देहरादून स्थित भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII) ने एक विस्तृत अध्ययन के बाद कान्हा टाइगर रिजर्व को इस पुनरुद्धार के लिए सबसे उपयुक्त माना है। इसके पीछे मुख्य कारण हैं:

  1. विस्तृत और समृद्ध घास के मैदान (Grasslands)।
  2. पानी के प्रचुर स्रोत।
  3. मानवीय हस्तक्षेप का न्यूनतम स्तर।
  4. शाकाहारी जीवों के लिए अनुकूल वातावरण।

जैव विविधता के लिए बड़ा कदम

जंगली पानी की भैंस वर्तमान में एक ‘लुप्तप्राय’ (Endangered) प्रजाति है, जिसकी वैश्विक आबादी 4,000 से भी कम है। भारत में इनकी मुख्य आबादी असम में केंद्रित है। इस समझौते से न केवल मध्य प्रदेश को अपनी खोई हुई विरासत वापस मिलेगी, बल्कि असम के जंगलों में मध्य प्रदेश के बाघों और मगरमच्छों के आने से वहां की ‘जेनेटिक विविधता’ (Genetic Diversity) भी बढ़ेगी।


विशेषज्ञों की राय: वन्यजीव विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के ‘ट्रांसलोकेशन’ प्रोजेक्ट्स भारत के संरक्षण प्रयासों को नई दिशा देंगे। इससे न केवल पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा, बल्कि भविष्य में इन प्रजातियों के विलुप्त होने का खतरा भी कम होगा।

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