सेकेंडरी PM2.5 भारत में वायु प्रदूषण का बड़ा कारण: CREA

सेंटर फॉर रिसर्च ऑन एनर्जी एंड क्लीन एयर (CREA) के एक नए विश्लेषण ने भारत में वायु प्रदूषण की गंभीर स्थिति पर एक नया दृष्टिकोण पेश किया है। रिपोर्ट के अनुसार, भारत में PM2.5 प्रदूषण का एक बड़ा हिस्सा (लगभग 42 प्रतिशत) सीधे स्रोतों से उत्सर्जित नहीं होता है, बल्कि वातावरण में मौजूद विभिन्न गैसों के बीच होने वाली रासायनिक प्रतिक्रियाओं के परिणामस्वरूप ‘सेकंडरी पार्टिकुलेट मैटर’ के रूप में बनता है।


अमोनियम सल्फेट: प्रदूषण का मुख्य रासायनिक कारक

अध्ययन में पाया गया है कि इस सेकंडरी प्रदूषण का मुख्य घटक अमोनियम सल्फेट है। यह तब बनता है जब वातावरण में सल्फर डाइऑक्साइड ($SO_2$) और अमोनिया ($NH_3$) के बीच प्रतिक्रिया होती है।

  • प्रमुख स्रोत: कोयले से चलने वाले पावर प्लांट राष्ट्रीय $SO_2$ उत्सर्जन में कम से कम 60 प्रतिशत का योगदान करते हैं।
  • भारत की स्थिति: भारत वर्तमान में दुनिया में $SO_2$ का सबसे बड़ा उत्सर्जक बना हुआ है।

क्षेत्रीय प्रभाव: छत्तीसगढ़ और ओडिशा सबसे अधिक प्रभावित

रिपोर्ट में उन राज्यों की पहचान की गई है जहाँ वार्षिक अमोनियम सल्फेट का योगदान सबसे अधिक है। ये दोनों राज्य कोयला आधारित बिजली उत्पादन के प्रमुख केंद्र हैं:

  1. छत्तीसगढ़: 42 प्रतिशत (सबसे अधिक योगदान)
  2. ओडिशा: 41 प्रतिशत

प्राथमिक बनाम माध्यमिक प्रदूषक: अंतर समझना जरूरी

प्रदूषण नियंत्रण की रणनीतियों के लिए इन दोनों के बीच का अंतर समझना अनिवार्य है:

  • प्राथमिक प्रदूषक (Primary Pollutants): ये सीधे स्रोतों (जैसे कार के धुएं या फैक्ट्री) से निकलते हैं। उदाहरण: पार्टिकुलेट मैटर, कार्बन मोनोऑक्साइड, नाइट्रोजन ऑक्साइड और सल्फर ऑक्साइड।
  • माध्यमिक प्रदूषक (Secondary Pollutants): ये तब बनते हैं जब प्राथमिक प्रदूषक वायुमंडल में एक-दूसरे के साथ या सूरज की रोशनी के साथ प्रतिक्रिया करते हैं। उदाहरण: अमोनियम सल्फेट, जमीनी स्तर का ओजोन और धुंध (Aerosols)।

जमीनी स्तर का ओजोन: एक और अदृश्य खतरा

रिपोर्ट में ट्रोपोस्फेरिक (जमीनी स्तर) ओजोन के बारे में भी चेतावनी दी गई है। यह गैस सीधे हवा में नहीं निकलती, बल्कि नाइट्रोजन ऑक्साइड ($NO_x$) और वाष्पशील कार्बनिक यौगिकों (VOCs) के बीच सूरज की रोशनी में होने वाली रासायनिक प्रतिक्रिया से बनती है। इसके मुख्य स्रोत कारों, रिफाइनरियों और केमिकल प्लांट से निकलने वाले प्रदूषक हैं।

विशेषज्ञों की सिफारिश: FGD तकनीक को अनिवार्य बनाना

CREA ने चेतावनी दी है कि जब तक सेकंडरी पार्टिकुलेट मैटर की समस्या का समाधान नहीं किया जाता, तब तक नेशनल क्लीन एयर प्रोग्राम (NCAP) के तहत हवा की गुणवत्ता में सुधार सीमित और अल्पकालिक रहेगा।

  • समाधान: सभी कोयला आधारित थर्मल पावर प्लांट में फ्लू गैस डिसल्फराइजेशन (FGD) तकनीक को अनिवार्य रूप से लागू करना। यह तकनीक $SO_2$ उत्सर्जन को कम करने में सबसे प्रभावी है, जिससे अंततः PM2.5 के स्तर में बड़ी गिरावट आ सकती है।
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