बच्चों द्वारा सोशल मीडिया के उपयोग पर प्रतिबंध को लेकर चर्चाएं
कर्नाटक और आंध्र प्रदेश ने क्रमशः 16 वर्ष से कम और 13 वर्ष से कम उम्र के बच्चों द्वारा सोशल मीडिया के उपयोग पर प्रतिबंध लगाने की घोषणा की है। लेकिन ये घोषणाएं एक जानी-पहचानी बाधा का सामना कर सकती हैं क्योंकि इंटरनेट का विनियमन विशेष रूप से केंद्र सरकार के अधिकार क्षेत्र में आता है।
सोशल मीडिया पर आयु-आधारित प्रतिबंध: मुख्य बिंदु
1. भारत में कानूनी स्थिति (Legal Framework)
- क्षेत्राधिकार (Jurisdiction): राज्यों (कर्नाटक और आंध्र प्रदेश) ने प्रतिबंध की घोषणा तो की है, लेकिन इंटरनेट विनियमन केंद्र सरकार (Union Government) का विशेष कार्यक्षेत्र है।
- केंद्रीय कानून: भारत का डिजिटल ढांचा मुख्य रूप से IT अधिनियम (IT Act) और IT नियमों द्वारा संचालित होता है।
- आगामी कदम: केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव ने संकेत दिया है कि केंद्र आयु-आधारित प्रतिबंधों पर चर्चा कर रहा है, लेकिन अभी कार्यान्वयन की समयरेखा तय नहीं है।
2. आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 की सिफारिशें
- डिजिटल व्यसन (Digital Addiction): सर्वेक्षण में बच्चों के लिए आयु सीमा और उन पर लक्षित ‘डिजिटल विज्ञापनों’ पर रोक लगाने की वकालत की गई है।
- चिंता का विषय: युवाओं में बढ़ती डिजिटल लत और मानसिक स्वास्थ्य पर इसके प्रतिकूल प्रभाव।
3. वैश्विक उदाहरण (Global Trend)
| देश | कदम/घोषणा |
| ऑस्ट्रेलिया | दिसंबर 2026 में बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर प्रतिबंध लगाने वाला पहला देश बना। |
| इंडोनेशिया | 16 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिए इंस्टाग्राम और ‘उच्च जोखिम’ वाले प्लेटफार्मों को प्रतिबंधित करने की तैयारी। |
| फ्रांस | राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रॉन ने भारत-AI इम्पैक्ट समिट में भारत को भी ऐसे प्रतिबंधों पर विचार करने का सुझाव दिया। |
चुनौतियाँ और आलोचनात्मक दृष्टिकोण
- असमान प्रतिक्रिया: ‘इंटरनेट फ्रीडम फाउंडेशन’ (IFF) के अनुसार, पूर्ण प्रतिबंध एक “अनुचित प्रतिक्रिया” है। यह समस्या के मूल कारणों (जैसे एल्गोरिथम डिजाइन और खराब डेटा सुरक्षा) को हल करने के बजाय बच्चों के सूचना और अभिव्यक्ति के अधिकार को छीनता है।
- लैंगिक डिजिटल अंतर (Gender Digital Divide): भारत में लड़कियां पहले से ही डिजिटल पहुंच में बाधाओं का सामना करती हैं। ‘सुरक्षा’ के नाम पर लगाया गया प्रतिबंध उनके लिए कनेक्टिविटी के दरवाजों को पूरी तरह बंद करने का एक हथियार बन सकता है।
- साक्ष्य की कमी: आलोचकों का तर्क है कि भारत में बड़े पैमाने पर ऐसे अनुभवजन्य प्रमाण (Empirical Evidence) उपलब्ध नहीं हैं जो इतने कठोर प्रतिबंध को सही ठहरा सकें।


