INSV कौंडिन्य ओमान के लिए रवाना
भारतीय समुद्री इतिहास में आज एक नया पन्ना जुड़ गया है। भारतीय नौसेना का विशेष जहाज़ INSV कौंडिन्य, जो प्राचीन और पारंपरिक तकनीकों से निर्मित है, अपनी पहली विदेश यात्रा के लिए गुजरात के पोरबंदर से ओमान के मस्कट के लिए रवाना हो गया। यह यात्रा केवल एक नौकायन नहीं, बल्कि उन प्राचीन समुद्री मार्गों को पुनर्जीवित करने का एक प्रतीकात्मक प्रयास है, जिन्होंने कभी भारत को हिंद महासागर के विशाल क्षेत्रों से जोड़ा था।
प्राचीन तकनीक: नारियल की रस्सी और लकड़ी का संगम
आधुनिक धातु विज्ञान और वेल्डिंग के दौर में, INSV कौंडिन्य अपनी अनूठी निर्माण शैली के लिए चर्चा में है। इस जहाज़ की लकड़ी के तख्तों को धातु की कीलों के बजाय नारियल की रस्सी से सिला गया है और इसे वॉटरप्रूफ बनाने के लिए प्राकृतिक रेज़िन से सील किया गया है। निर्माण की यह ‘सिलाई’ पद्धति (Stitched ship) प्राचीन भारत में बेहद प्रचलित थी, जिसने भारतीय नाविकों को पश्चिम एशिया, अफ्रीका और दक्षिण-पूर्व एशिया तक लंबी दूरी की यात्राएं करने में सक्षम बनाया था।
अजंता की कला से प्रेरित डिज़ाइन
INSV कौंडिन्य का डिज़ाइन 5वीं शताब्दी ईस्वी की अजंता गुफाओं की पेंटिंग में दर्शाए गए जहाज़ों पर आधारित है। इसकी मुख्य विशेषताएं प्राचीन भारतीय गौरव को दर्शाती हैं:
- पाल (Sails): इन पर ‘गंडभेरुंड’ और सूर्य के रूपांकन (Motifs) अंकित हैं।
- धनुष (Bow): जहाज़ के अगले हिस्से पर सिंह याली (एक पौराणिक जीव) की नक्काशी की गई है।
- लंगर (Anchor): इसके डेक पर हड़प्पा शैली का एक प्रतीकात्मक पत्थर का लंगर रखा गया है।
कुशल कारीगरी और त्रिपक्षीय सहयोग
इस महत्त्वाकांक्षी परियोजना की शुरुआत केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय, भारतीय नौसेना और होडी इनोवेशन के बीच एक त्रिपक्षीय समझौते के तहत हुई थी। जहाज़ का निर्माण सितंबर 2023 में शुरू हुआ था, जिसे केरल के कुशल कारीगरों की एक टीम ने मास्टर शिपराइट बाबू शंकरन के मार्गदर्शन में पूरा किया। फरवरी 2025 में गोवा में लॉन्च होने के बाद, यह जहाज़ अब अपने ऐतिहासिक मिशन पर निकल चुका है।
सांस्कृतिक राजदूत के रूप में ‘कौंडिन्य’
इस जहाज़ का नाम प्राचीन भारतीय नाविक ‘कौंडिन्य’ के नाम पर रखा गया है, जिन्होंने हिंद महासागर पार कर दक्षिण-पूर्व एशिया में भारतीय संस्कृति और व्यापार का विस्तार किया था। यह प्रोजेक्ट भारत की समृद्ध स्वदेशी ज्ञान प्रणालियों को फिर से खोजने और दुनिया के सामने पेश करने की एक बड़ी पहल का हिस्सा है।
यह यात्रा न केवल प्राचीन नेविगेशन कौशल का परीक्षण करेगी, बल्कि भारत और ओमान के बीच के सदियों पुराने व्यापारिक और सांस्कृतिक संबंधों को भी और मजबूती प्रदान करेगी।


