श्रीलंका में पवित्र देवनिमोरी अवशेषों का प्रदर्शन
भारत एक प्रमुख आध्यात्मिक और सांस्कृतिक पहल के हिस्से के रूप में 4 से 10 फरवरी तक श्रीलंका में भगवान बुद्ध के पवित्र देवनिमोरी अवशेषों (Devnimori Relics) का प्रदर्शन करेगा। यह आयोजन दोनों देशों के बीच सदियों पुराने सभ्यतागत संबंधों को और प्रगाढ़ करेगा।
मुख्य विवरण:
- स्थान: इन अवशेषों की सार्वजनिक प्रदर्शनी कोलंबो के ऐतिहासिक गंगारामया मंदिर में आयोजित की जाएगी।
- वापसी: अवशेष 11 फरवरी को वापस भारत लौटेंगे।
- पृष्ठभूमि: यह प्रदर्शनी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अप्रैल 2025 की श्रीलंका यात्रा के दौरान व्यक्त किए गए दृष्टिकोण का परिणाम है, जो साझा बौद्ध विरासत पर आधारित सांस्कृतिक कूटनीति के प्रति भारत की प्रतिबद्धता को दर्शाती है।
देवनिमोरी अवशेषों का इतिहास और महत्व
ये अवशेष वर्तमान में गुजरात के वडोदरा में महाराजा सयाजीराव विश्वविद्यालय में संरक्षित हैं।
- उत्खनन: ये अवशेष गुजरात के अरावली जिले में शामलाजी के पास देवनिमोरी पुरातत्व स्थल से प्राप्त हुए हैं। इसकी खुदाई 1957 में पुरातत्वविद् एस. एन. चौधरी द्वारा की गई थी।
- ऐतिहासिक साक्ष्य: यह स्थल ईस्वी सन की शुरुआती शताब्दियों का है, जो पश्चिमी भारत में बौद्ध धर्म के प्रसार को प्रमाणित करता है।
- अवशेष मंजूषा (Casket): देवनिमोरी स्तूप के भीतर 24 फीट की ऊंचाई पर मिली यह मंजूषा हरे रंग के शिस्ट पत्थर (Green Schist) से बनी है।
- शिलालेख: इस पर ब्राह्मी लिपि और संस्कृत में “दशबल शरीर निलय” लिखा है, जिसका अर्थ है “बुद्ध के शारीरिक अवशेषों का निवास”।
- भीतर की सामग्री: इस मंजूषा के भीतर एक तांबे का बक्सा था जिसमें पवित्र राख, रेशमी कपड़ा, मोती और सोने की परत वाला चांदी का पात्र (अधूरा पाठ यहाँ समाप्त होता है) शामिल था।
यह पहल न केवल धार्मिक श्रद्धा का विषय है, बल्कि दक्षिण एशिया में भारत की ‘Soft Power’ और ‘Neighbourhood First’ नीति का एक जीवंत उदाहरण भी है।


