IIT मद्रास ने स्वदेशी सुपरकंप्यूटर ‘परम शक्ति’ का किया अनावरण

भारत ने हाई-परफॉर्मेंस कंप्यूटिंग (HPC) के क्षेत्र में एक और बड़ी उपलब्धि हासिल की है। इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (IIT) मद्रास ने पूरी तरह से स्वदेशी रूप से डिजाइन और निर्मित सुपरकंप्यूटर ‘परम शक्ति’ को लॉन्च करने की घोषणा की है। यह अत्याधुनिक मशीन भारत के ‘नेशनल सुपरकंप्यूटिंग मिशन’ (NSM) के तहत एक गेम-चेंजर साबित होने वाली है।

अतुलनीय गति और क्षमता

‘परम शक्ति’ की गणना क्षमता इसे दुनिया के शक्तिशाली सुपरकंप्यूटरों की श्रेणी में खड़ा करती है।

  • परफॉर्मेंस: यह 3.1 पेटाफ्लॉप्स की गति से कार्य करता है, जिसका अर्थ है कि यह प्रति सेकंड 3.1 क्वाड्रिलियन (3,100,000,000,000,000) से अधिक गणनाएँ कर सकता है।
  • तकनीकी ढांचा: इसके इंफ्रास्ट्रक्चर में बिना रुकावट बिजली की आपूर्ति, उन्नत कूलिंग सिस्टम और ऊर्जा-कुशल डेटा सेंटर ऑपरेशंस शामिल हैं, जो इसे लंबे समय तक उच्च क्षमता पर कार्य करने में सक्षम बनाते हैं।

इन क्षेत्रों में आएगी रिसर्च की बाढ़

विशेषज्ञों का मानना है कि इस सुपरकंप्यूटर की उपलब्धता से न केवल IIT मद्रास, बल्कि पूरे देश के शोधकर्ताओं को मदद मिलेगी। यह मुख्य रूप से निम्नलिखित क्षेत्रों में रिसर्च को नई दिशा देगा:

  • एयरोस्पेस और एडवांस्ड मैन्युफैक्चरिंग
  • पर्यावरण अध्ययन और मौसम पूर्वानुमान
  • फार्मास्यूटिकल्स और ड्रग डिस्कवरी
  • मटीरियल इंजीनियरिंग

नेशनल सुपरकंप्यूटिंग मिशन (NSM): एक विजन

2015 में शुरू किया गया यह मिशन इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) और विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग (DST) की एक संयुक्त पहल है।

  • प्रबंधन: सेंटर फॉर डेवलपमेंट ऑफ एडवांस्ड कंप्यूटिंग (C-DAC) इसके विकास और वितरण का नेतृत्व कर रहा है।
  • लक्ष्य: भारत को वैश्विक सुपरकंप्यूटिंग मानचित्र पर अग्रणी बनाना और वैज्ञानिक प्रगति के लिए एकेडमिक, इंडस्ट्री और सरकारी क्षेत्रों को एकजुट करना।

कौशल विकास पर जोर

मिशन केवल इंफ्रास्ट्रक्चर तक सीमित नहीं है। सुपरकंप्यूटिंग के क्षेत्र में भविष्य के विशेषज्ञ तैयार करने के लिए पुणे, खड़गपुर, चेन्नई, पलक्कड़ और गोवा में पाँच विशेष प्रशिक्षण केंद्र स्थापित किए गए हैं। ये केंद्र कॉलेज छात्रों और शोधकर्ताओं के बीच जागरूकता और तकनीकी कौशल बढ़ाने का कार्य कर रहे हैं।

‘परम शक्ति’ के आने से भारत अब जटिल वैज्ञानिक समस्याओं को सुलझाने और तकनीकी नवाचार के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की ओर एक कदम और करीब पहुँच गया है।

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