मूसा सिक्किमेंसिस
नागालैंड विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने पूर्वी हिमालय और पूर्वोत्तर भारत की एक जंगली केला प्रजाति ‘मूसा सिक्किमेंसिस’ (Musa sikkimensis) की आनुवंशिक विविधता पर एक व्यापक अध्ययन किया है। यह अध्ययन जलवायु लचीलेपन (climate resilience), खाद्य सुरक्षा और टिकाऊ कृषि विकास के लिए इसके महत्व को रेखांकित करता है।
अनुसंधान टीम के अनुसार, मूसा सिक्किमेंसिस, जिसे आमतौर पर ‘दार्जिलिंग केला’ या ‘सिक्किम केला’ के रूप में जाना जाता है, एक जंगली बीज वाली प्रजाति है जो एक महत्वपूर्ण आनुवंशिक भंडार (genetic reservoir) के रूप में कार्य करती है। इसमें रोग प्रतिरोधक क्षमता, पर्यावरणीय तनाव सहिष्णुता और जलवायु अनुकूलन से जुड़े गुण मौजूद हैं, जो इसे भविष्य के केला प्रजनन और फसल सुधार कार्यक्रमों के लिए एक अमूल्य संसाधन बनाते हैं।
शोध के मुख्य निष्कर्ष और पहल:
- अनुकूलन क्षमता: हालांकि व्यावसायिक रूप से इसे खाने योग्य फलों के लिए नहीं उगाया जाता, लेकिन यह फसल की मजबूती और टिकाऊ उत्पादन सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। शोध में पाया गया कि स्थानीय केले के जर्मप्लाज्म में विभिन्न पर्यावरणीय परिस्थितियों में मजबूत अनुकूलन क्षमता है।
- संरक्षण की आवश्यकता: ‘नागालैंड, भारत में मूसा सिक्किमेंसिस लैंड रेस की आनुवंशिक विविधता की खोज’ शीर्षक वाला यह शोध दुनिया के सबसे समृद्ध जैव विविधता वाले क्षेत्रों में से एक में लुप्तप्राय केला जर्मप्लाज्म को संरक्षित करने की तत्काल आवश्यकता पर जोर देता है।
- केला जैव विविधता गलियारा (Banana Biodiversity Corridor): संरक्षण प्रयासों को मजबूत करने के लिए, नागालैंड विश्वविद्यालय ने अपने बागवानी विभाग में एक ‘बनाना बायोडायवर्सिटी कॉरिडोर’ स्थापित किया है।
- कार्यप्रणाली: यह कॉरिडोर एक ‘लिविंग फील्ड जीन बैंक’ के रूप में कार्य करता है, जो in-situ (स्व-स्थाने) और ex-situ (बाह्य-स्थाने) संरक्षण दृष्टिकोणों को जोड़ता है। यह आनुवंशिक अनुसंधान, जलवायु-अनुकूल प्रजनन कार्यक्रमों और राष्ट्रीय जर्मप्लाज्म सुरक्षा पहल का समर्थन करता है।
इस पहल का उद्देश्य खंडित केला विविधता की रक्षा करना, स्थानीय मूल्य श्रृंखलाओं (value chains) को मजबूत करना और भविष्य के कृषि विकास का समर्थन करना है।
Source: DD


