केला के ‘पनामा रोग’ पर शोध

फ्यूसेरियम विल्ट (Fusarium wilt) — जिसे पनामा रोग के नाम से भी जाना जाता है — एक विनाशकारी मिट्टी जनित बीमारी है जो अपने घातक ‘रेस 4’ (Race 4) स्ट्रेन के माध्यम से दुनिया भर में खेती किए जाने वाले कैवेन्डिश केलों को प्रभावित करती है। निर्यात किए जाने वाले अधिकांश केले एक ही किस्म के होते हैं, जिन्हें कैवेन्डिश कहा जाता है। लेकिन आनुवंशिक विविधता (genetic variation) की यह कमी इस फसल को असुरक्षित बनाती है। यह बीमारी केले के पौधे को मुरझा देती है और उसे मार देती है, जिससे मिट्टी में अवशेष रह जाते हैं जो भविष्य की फसलों को भी संक्रमित करते हैं।

ऑस्ट्रेलिया के क्वींसलैंड विश्वविद्यालय के दो वैज्ञानिकों — एंड्रयू चेन और एलिजाबेथ एटकेन — और उनकी टीम ने उस जीनोमिक क्षेत्र की पहचान की है जो फ्यूसेरियम विल्ट सब ट्रॉपिकल रेस 4 (STR4) के प्रति प्रतिरोध को नियंत्रित करता है। शोधकर्ताओं ने STR4 प्रतिरोध के स्रोत का पता ‘कलकत्ता 4’ में लगाया है, जो एक अत्यधिक उपजाऊ जंगली द्विगुणित (diploid) केला है। इसे द्विगुणित केला समूह की एक अलग उप-प्रजाति के संवेदनशील केलों के साथ क्रॉस कराकर यह खोज की गई।

‘डिप्लॉयड’ (Diploid) कोशिकाओं में गुणसूत्रों (chromosomes) के दो पूर्ण सेट होते हैं, जिनमें से एक प्रत्येक जनक से विरासत में मिलता है। मनुष्यों में इनकी कुल संख्या 46 (23 जोड़े) होती है।

भारत में आम के बाद केला (Musa sp.) दूसरी सबसे महत्वपूर्ण फल फसल है। केले का विकास दक्षिण-पूर्व एशिया के आर्द्र उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में हुआ, जिसमें भारत इसके उद्भव केंद्रों में से एक है। आधुनिक खाद्य किस्में दो प्रजातियों — मूसा एक्युमिनाटा (Musa acuminata) और मूसा बाल्बिसियाना (Musa balbisiana) तथा उनके प्राकृतिक संकरों से विकसित हुई हैं।

केला उत्पादन में भारत दुनिया में सबसे आगे है। केला कार्बोहाइड्रेट का एक समृद्ध स्रोत है और विटामिन, विशेष रूप से विटामिन B से भरपूर होता है।

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