पारिस्थितिकी विज्ञानी माधव गाडगिल का निधन
प्रसिद्ध पारिस्थितिकी विज्ञानी (Ecologist) माधव गाडगिल का 83 वर्ष की आयु में 7 जनवरी, 2026 को पुणे में निधन हो गया। वे पर्यावरण संरक्षण के प्रति अपने ‘बॉटम-अप’ (जन-केंद्रित) दृष्टिकोण और पश्चिमी घाटों के संरक्षण के संघर्ष के लिए सदैव याद किए जाएंगे।
प्रमुख योगदान और महत्वपूर्ण कार्य
- पश्चिमी घाट विशेषज्ञ पारिस्थितिकी पैनल (WGEEP): उन्होंने 2011 में इस पैनल की अध्यक्षता की थी, जिसे ‘गाडगिल रिपोर्ट’ के नाम से जाना जाता है।
- सिफारिश: पैनल ने पश्चिमी घाट के 75% हिस्से (लगभग 1,29,037 वर्ग किमी) को पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र (ESA) घोषित करने का सुझाव दिया था।
- स्थिति: हालांकि इस रिपोर्ट को 15 साल बीत चुके हैं, लेकिन राज्यों के विरोध के कारण केंद्र सरकार ने अभी तक इन क्षेत्रों को पूरी तरह अधिसूचित नहीं किया है।
- संस्थान निर्माण: उन्होंने 31 वर्षों तक भारतीय विज्ञान संस्थान (IISc), बेंगलुरु में अपनी सेवाएँ दीं और वहाँ सेंटर फॉर इकोलॉजिकल साइंसेज (CES) की स्थापना की।
- नीतिगत भूमिका: वे भारत के जैविक विविधता अधिनियम (Biological Diversity Act) का मसौदा तैयार करने वाली टीम का हिस्सा थे।
प्रमुख उपलब्धियाँ और सम्मान
| उपलब्धि | विवरण |
| अनुसंधान | आदिवासियों, किसानों और मछुआरों के सहयोग से बुनियादी जमीनी शोध। |
| परामर्श | ग्लोबल एनवायरनमेंट फैसिलिटी के विज्ञान और प्रौद्योगिकी सलाहकार पैनल के अध्यक्ष। |
| चैंपियंस ऑफ द अर्थ | संयुक्त राष्ट्र (UNEP) द्वारा 2024 में इस प्रतिष्ठित सम्मान से नवाजा गया। |
विरासत
गाडगिल का मानना था कि पर्यावरण संरक्षण केवल कानूनों से नहीं, बल्कि स्थानीय समुदायों की भागीदारी और उनके अधिकारों को सुनिश्चित करके ही संभव है। उनके निधन से भारत ने एक ऐसा वैज्ञानिक खो दिया है जिसने विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन की स्पष्ट रूपरेखा तैयार की थी।


