CSR पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला: ‘पर्यावरण संरक्षण’ अब कंपनियों के लिए दान नहीं, संवैधानिक जिम्मेदारी

उच्चतम न्यायालय (Supreme Court) ने कॉर्पोरेट जगत के उत्तरदायित्वों को लेकर एक युगांतकारी व्याख्या पेश की है। न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि कॉर्पोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी (CSR) को कॉर्पोरेट एनवायरनमेंटल रिस्पॉन्सिबिलिटी (CER) से अलग नहीं किया जा सकता। कोर्ट के अनुसार, कोई भी कंपनी पर्यावरण और पारिस्थितिकी तंत्र की अनदेखी कर खुद को ‘सामाजिक रूप से जिम्मेदार’ नहीं कह सकती।

ग्रेट इंडियन बस्टर्ड (GIB) केस में निर्देश

यह टिप्पणी सुप्रीम कोर्ट की एक बेंच ने लुप्तप्राय पक्षी ‘ग्रेट इंडियन बस्टर्ड’ के संरक्षण के मामले में सुनवाई के दौरान की। राजस्थान और गुजरात में गैर-नवीकरणीय बिजली संयंत्रों (Non-renewable power plants) से इस प्रजाति के अस्तित्व पर संकट मंडरा रहा है।

अदालत ने कहा कि जब कॉर्पोरेट गतिविधियाँ (जैसे खनन या बिजली उत्पादन) किसी प्रजाति के आवास को नुकसान पहुँचाती हैं, तो ‘प्रदूषक भुगतान करेगा’ (Polluter Pays Principle) के तहत कंपनी को उस प्रजाति की रिकवरी का खर्च उठाना होगा। इसके लिए CSR फंड को इन-सीटू (In-situ) और एक्स-सीटू (Ex-situ) संरक्षण प्रयासों में लगाया जाना चाहिए।


संवैधानिक और कानूनी आधार

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले को संविधान के मूल कर्तव्यों से जोड़ा है:

  • अनुच्छेद 51A(g): यह प्रत्येक नागरिक (और कानूनी व्यक्ति के रूप में कॉर्पोरेशन) का कर्तव्य है कि वह जंगलों, झीलों, नदियों और वन्यजीवों सहित प्राकृतिक पर्यावरण की रक्षा करे।
  • धारा 135 (कंपनी अधिनियम, 2013): कोर्ट के अनुसार, संसद ने इस धारा के जरिए संवैधानिक कर्तव्यों को संस्थागत रूप दिया है। पर्यावरण की सुरक्षा करना अब कोई स्वैच्छिक दान नहीं, बल्कि एक अनिवार्य संवैधानिक दायित्व है।

कौन सी कंपनियाँ आती हैं CSR के दायरे में?

कंपनी अधिनियम, 2013 के तहत, जिन कंपनियों की वित्तीय स्थिति नीचे दी गई श्रेणियों में आती है, उन्हें अपने पिछले तीन वर्षों के औसत शुद्ध लाभ का कम से कम 2% CSR गतिविधियों पर खर्च करना अनिवार्य है:

मानदंडवित्तीय सीमा
नेट वर्थ (Net Worth)₹500 करोड़ या उससे अधिक
टर्नओवर (Turnover)₹1,000 करोड़ या उससे अधिक
शुद्ध लाभ (Net Profit)₹5 करोड़ या उससे अधिक

महत्वपूर्ण निष्कर्ष

अदालत ने जोर देकर कहा कि कंपनियों को अब अपनी व्यावसायिक गतिविधियों से होने वाले पर्यावरणीय नुकसान की भरपाई के लिए सक्रिय रूप से फंड आवंटित करना होगा। इसे केवल एक कानूनी प्रक्रिया के बजाय ‘प्राणी मात्र के प्रति दया’ और संवैधानिक निष्ठा के रूप में देखा जाना चाहिए।

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