व्हेल की सांसों में मिला जानलेवा ‘सिटेशियन मॉर्बिलिवायरस’
वैज्ञानिकों ने आर्कटिक क्षेत्र में समुद्री स्तनधारियों (Mammals) की रहस्यमयी मौतों के पीछे एक बेहद खतरनाक वायरस का पता लगाया है। ताज़ा शोध के अनुसार, जंगली व्हेल की सांसों में ‘सिटेशियन मॉर्बिलिवायरस’ (Cetacean Morbillivirus) पाया गया है, जो दुनिया भर में व्हेल और डॉल्फ़िन के बड़ी संख्या में मरने और समुद्र तटों पर फंसने का एक प्रमुख कारण रहा है।
ड्रोन तकनीक का कमाल: पहली बार ली गई व्हेल की ‘सांस’
आर्कटिक के दुर्गम इलाकों में रहने वाली जंगली व्हेल के स्वास्थ्य की जांच करना हमेशा से कठिन रहा है। इस चुनौती से निपटने के लिए शोधकर्ताओं ने ड्रोन (Drones) का सहारा लिया।
- प्रक्रिया: शोधकर्ताओं ने लाइव कैमरा फुटेज का उपयोग कर ड्रोन को ठीक उस समय व्हेल के ऊपर उड़ाया जब वह सांस लेने के लिए सतह पर आई।
- नमूना संग्रह: व्हेल के ‘ब्लोहोल’ (Blowhole) से निकलने वाली फुहारों को ड्रोन से जुड़ी एक विशेष ‘पेट्री डिश’ पर इकट्ठा किया गया। यह पहली बार है जब इस तकनीक के माध्यम से आर्कटिक जल में इस वायरस की मौजूदगी की पुष्टि हुई है।
क्या है ‘सिटेशियन मॉर्बिलिवायरस’?
‘सिटेशियन’ शब्द का इस्तेमाल व्हेल, डॉल्फ़िन और पॉरपॉइज़ की सभी 90 प्रजातियों के लिए किया जाता है। यह वायरस इन समुद्री जीवों के लिए घातक साबित होता है:
- खोज: इसकी पहचान पहली बार 1987 में हुई थी।
- प्रभावित क्षेत्र: अब तक यह मुख्य रूप से नॉर्थ अटलांटिक और मेडिटेरेनियन (भूमध्य सागर) में सक्रिय था, लेकिन अब यह आर्कटिक तक पहुँच गया है।
- लक्षण: यह वायरस मुख्य रूप से जानवरों के श्वसन तंत्र (Respiratory system) और तंत्रिका तंत्र (Neurological system) पर हमला करता है, जिससे वे दिशाहीन होकर तटों पर फंस जाते हैं।
व्हेल: पानी में रहने वाली पर हमारी तरह सांस लेने वाली मैमल्स
अक्सर लोग व्हेल और डॉल्फ़िन को मछली समझ लेते हैं, लेकिन वे स्तनधारी (Mammals) हैं। उनकी श्वसन प्रक्रिया इंसानों से काफी मिलती-जुलती है:
- फेफड़े और हवा: मछलियों की तरह उनके पास गलफड़े (Gills) नहीं होते; वे अपने फेफड़ों में हवा भरती हैं।
- ब्लोहोल: उनके सिर के ऊपरी हिस्से पर एक छेद होता है जिसे ‘ब्लोहोल’ कहते हैं, जो हमारी नाक की तरह काम करता है।
- संक्रमण का खतरा: यह वायरस सांस की बूंदों (Respiratory droplets) और सीधे संपर्क के माध्यम से एक जीव से दूसरे में तेजी से फैलता है।
महत्वपूर्ण शोध: ‘डीप ब्रीद आउट’
यह महत्वपूर्ण जानकारी ‘BMC वेटरनरी रिसर्च’ जर्नल में प्रकाशित एक अध्ययन में सामने आई है। इस स्टडी का शीर्षक है— ‘Deep breath out: Molecular survey of selected pathogens in blow and skin biopsies from North Atlantic cetaceans’। वैज्ञानिकों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन के कारण पिघलती बर्फ और बदलते रास्तों की वजह से यह वायरस नए इलाकों में फैल रहा है।


