कार्बन कैप्चर, यूटिलाइजेशन और स्टोरेज (CCUS) क्या है?
बजट में अगले पांच वर्षों के लिए कार्बन कैप्चर, यूटिलाइजेशन और स्टोरेज (CCUS) समाधानों के विकास के लिए ₹20,000 करोड़ का आवंटन किया गया है। भारत के नेट-जीरो लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए यह तकनीक अत्यंत महत्वपूर्ण है।
कार्बन कैप्चर, यूटिलाइजेशन और स्टोरेज (CCUS) क्या है?
CCUS उन तकनीकों का समूह है जो औद्योगिक प्रक्रियाओं से निकलने वाली कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) को वायुमंडल में जाने से पहले ‘कैप्चर’ (पकड़ना) करती हैं। इसके बाद इस CO2 को या तो जमीन के नीचे गहरी भूगर्भीय संरचनाओं में स्थायी रूप से स्टोर (भंडारण) किया जाता है या फिर इसे उपयोगी रसायनों में परिवर्तित (उपयोग) किया जाता है।
CCUS का महत्व:
- पुराने संयंत्रों का आधुनिकीकरण: इसे मौजूदा बिजली और औद्योगिक संयंत्रों में ‘रेट्रोफिट’ (अतिरिक्त रूप से फिट) किया जा सकता है।
- कठिन क्षेत्रों (Hard-to-abate sectors) के लिए: यह सीमेंट, स्टील और रसायन जैसे भारी उद्योगों में उत्सर्जन कम करने का प्रमुख जरिया है।
- नकारात्मक उत्सर्जन: यह हवा से सीधे CO2 हटाकर उन उत्सर्जनों को संतुलित कर सकता है जिन्हें कम करना तकनीकी रूप से कठिन है।
कार्बन कैप्चर की प्रमुख विधियाँ
CO2 को कैप्चर करने के लिए मुख्य रूप से तीन तरीकों का उपयोग किया जाता है:
- पोस्ट-कंबशन (Post-combustion): ईंधन जलने के बाद निकलने वाली ‘फ्लू गैस’ से CO2 को अलग किया जाता है (जैसे रासायनिक सॉल्वैंट्स का उपयोग करके)।
- प्री-कंबशन (Pre-combustion): ईंधन को जलने से पहले ही हाइड्रोजन और CO2 के गैस मिश्रण में बदल दिया जाता है। CO2 को अलग करने के बाद बचा हुआ हाइड्रोजन ईंधन के रूप में उपयोग होता है।
- ऑक्सी-फ्यूल कंबशन (Oxy-fuel combustion): इसमें ईंधन को लगभग शुद्ध ऑक्सीजन के साथ जलाया जाता है, जिससे केवल CO2 और भाप (steam) उत्पन्न होती है, जिसे आसानी से कैप्चर किया जा सकता है।
वैश्विक स्थिति और चुनौतियाँ
| विवरण | वर्तमान आंकड़े |
| वैश्विक वार्षिक उत्सर्जन | लगभग 40 बिलियन टन CO2 |
| वर्तमान कैप्चर क्षमता | लगभग 50 मिलियन टन (कुल उत्सर्जन का < 0.5%) |
| प्रमुख निवेशक देश | अमेरिका, यूरोप, चीन और अब भारत |
निष्कर्ष: यद्यपि अमेरिका और चीन जैसे देश इस क्षेत्र में आगे बढ़ रहे हैं, लेकिन वर्तमान में कैप्चर की जा रही CO2 की मात्रा कुल वैश्विक उत्सर्जन के आधे प्रतिशत से भी कम है। भारत का ₹20,000 करोड़ का निवेश इस अंतर को पाटने की दिशा में एक बड़ा कदम है।


