बाल विवाह मुक्त भारत

भारत सरकार ने ‘बाल विवाह मुक्त भारत’ अभियान के तहत एक निर्णायक लक्ष्य निर्धारित किया है। केंद्र सरकार की ताजा रिपोर्ट के अनुसार, देश का लक्ष्य साल 2026 तक बाल विवाह की दर को 10% से नीचे लाना और 2030 तक पूरे भारत को बाल विवाह मुक्त बनाना है। इस सामाजिक बदलाव की दिशा में छत्तीसगढ़ के बालोद जिले ने पूरे देश के लिए एक नई मिसाल पेश की है।

प्रमुख उपलब्धियां और अभियान

  • छत्तीसगढ़ का गौरव: बालोद जिला वर्ष 2025 में भारत का पहला बाल विवाह मुक्त जिला बन गया है। पिछले दो वर्षों में यहाँ की 436 ग्राम पंचायतों और शहरी निकायों में बाल विवाह का एक भी मामला दर्ज नहीं हुआ है।
  • सूरजपुर की सफलता: 17 सितंबर 2025 को सूरजपुर जिले की 75 ग्राम पंचायतों को भी ‘बाल विवाह मुक्त पंचायत’ घोषित किया गया।
  • 100 दिवसीय सघन अभियान: नवंबर 2024 में शुरू हुआ यह विशेष जागरूकता अभियान मार्च 2026 तक जारी रहेगा, जिसका उद्देश्य जमीनी स्तर पर समुदायों को सशक्त बनाना है।

कानूनी सख्ती और नया प्रावधान

सरकार ने स्पष्ट किया है कि बाल विवाह न केवल एक सामाजिक बुराई है, बल्कि एक जघन्य अपराध भी है।

  1. भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023: नए कानून के अनुसार, यदि कोई पुरुष 18 वर्ष से कम उम्र की पत्नी के साथ यौन संबंध बनाता है, तो इसे बलात्कार माना जाएगा।
  2. पॉक्सो (POCSO) एक्ट: सर्वोच्च न्यायालय के आदेशानुसार, ऐसी स्थिति को गंभीर यौन उत्पीड़न माना जाएगा जो पॉक्सो अधिनियम के तहत दंडनीय है।
  3. परिभाषा: कानून के तहत विवाह के लिए महिला की आयु 18 वर्ष और पुरुष की आयु 21 वर्ष से कम होना बाल विवाह की श्रेणी में आता है।

चुनौतियां और रणनीतिक कदम

राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5 (2019-21) के आंकड़े बताते हैं कि देश में अब भी 23% महिलाओं का विवाह 18 वर्ष से पहले हो जाता है। पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में इसकी घटनाएं अधिक देखी गई हैं।

सरकार की रणनीति:

  • तकनीकी सहायता: ‘बाल विवाह मुक्त भारत’ (BvMB) पोर्टल के माध्यम से तकनीक-सक्षम रिपोर्टिंग की जा रही है।
  • संस्थागत ढांचा: बाल विवाह निषेध अधिकारियों (CMPO) और ‘वन स्टॉप सेंटर्स’ (OSC) को डेटा-आधारित गतिविधियों के लिए प्रशिक्षित किया जा रहा है।
  • एकीकृत दृष्टिकोण: स्वास्थ्य, शिक्षा और ग्रामीण विकास मंत्रालयों के बीच निरंतर समन्वय के साथ ‘बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ’ अभियान को और मजबूती दी जा रही है।

निष्कर्ष: विशेषज्ञों का मानना है कि बालोद और सूरजपुर जैसे जिलों की सफलता यह दर्शाती है कि यदि प्रशासनिक इच्छाशक्ति और सामुदायिक भागीदारी एक साथ मिले, तो 2030 तक भारत को इस कुप्रथा से पूरी तरह मुक्त करने का संकल्प सिद्ध हो सकता है।

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